कवि परिचय — आलम जी
आलमजी का जन्म सं. 1530-1610 में अनुमानित है। ये हजुरी कवि थे। जम्भसार में आलमजी की कथा विस्तार से वर्णित की है। इन्होनें अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की है। तथा गायन विद्या में बड़े ही निपुण थे। इनके द्वारा रचित 8 साखियां एवं 12 हरजस प्राप्त है। प्रथम जुमलै की साखी इनकी यह प्रचलित है।
कलि मां कलम फिरी, अब छोड़ो मेरा आलमै सिंवरियो, जुग चौथे फेरा । जुग चौथे विष्णु मिलियो, हाथ जप माला जपै । खांध पूगी लेवो लेखो, हुकम हांसल रवि तपै । छेद कालंग चढ़े दुल-दुल, गिणै मेर न तेरियां । अलख लखो गुरु जम्भ पिछाण, कलि मां कलम फेरियां ।१।
आलम जी कहते है कि कलयुग में गुरु जाम्भोजी ने मर्यादा की पाल बांध दी है। सभी को सचेत कर दिया है। इस समय अहंकार को परित्याग करो। इस चोथे युग में फिर से प्रभु का आना हुआ है। स्मरण कीजिये इस चौथे युग में विष्णु से मिलन हुआ है। स्वयं विष्णु ही हाथ में माला लेकर जप करते हुए दिखाई दे रहे है। यही शिक्षा अन्य सभी को दे रहे है। यही विष्णु ही मृत्यु के बाद में हिसाब पूछेंगे। इन्हीं की आज्ञा से सूर्य समय पर उगता है और तपता है। कलयुग का छेदन करके स्वयं सूर्य की भांति अन्धकार रूपी अज्ञान का नाश करने के लिये सर्वत्र रथ पर सवार होकर भ्रमण कर रहे है। उनके लिये अपना पराया कोई नहीं है। जो भी प्रेम भाव से स्मरण करता है उसके वे हो जाते है। उस अलख अगम्य देव रूपी जाम्भोजी को पहचानों। जिन्होनें कलयुग में आकर विजय पताका फहरा दी है ।१।
गाफल भूल रहया, गुरु म्हारे साध चेताया । सुर तेतीसां मिलिया, शुभ सहज समाया । सहज सुर तेतीसां मिलिया, जोर जरब वसेखियां । एक एकू कर ध्यावो, सरब पुन बसेखियां । खरा खोटा परख लेसी, खलक तुल विन तोलिया । पोह विन क्यों रंग राचो, मोख गाफिल भूलिये ।२।
इस समय भी जो गाफिल मूर्ख बैचेन लोग है वे तो भूल रहे है। हमारे सतगुरु ने साधु संतों को सचेत कर दिया है। तेतीस करोड़ देवताओं से मिलन हो गया है। यह कार्य सहज भाव से ही हो गया है। सतगुरु तो सहज ही में सुरों से मिलान करवा देते है परन्तु वे अपने को शेख सिद्ध कहने वाले जोर जबरदस्ती भी करते है। इस समय वे ही सेणियां भूत प्रेत उपासक पुनः एक ईश्वर को मानकर ध्यान करने लगे है। वे विष्णु तो खरे तथा खोटे की खबर लेने वाले है सच्चे पारखी है। सम्पूर्ण संसार को बिना तराजू तोलने वाले सच्चे न्यायकारी है। बिना सद्मार्ग का अनुसरण किये क्यों किसी कुमार्ग में चलते हो वहां उस मार्ग से मोक्ष कहां मिलेगा ।२।
हंस राजा मोख लहै, सुकरत क्यों न करियो । मन में संतोष करो, कुछ अजर भी जरियो । अजर जरियो जीव काजै, पंथ होय सुहेल हो । संसार राता फिरै गाफिल, अन्त होय दुहेल हो । काया मसीती मन मुल्लाणों, सीदक एक ध्याइयो । पठ किताब कुरांण करणी, मोक्ष हंसा पाइयो ।३।
हंस राजा निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त करेगा। उस परम गति के लिये सुक्रत क्यों नहीं करते। मन में संतोष रखते हुए अजर काम क्रोधादि को क्यों नहीं जला देते हो। इस जीव की भलाई के लिये अवश्य ही जरणा करो। इससे तुम्हारा मार्ग सुख कर हो जायेगा। मूर्ख लोग तो संसार के रंग में रचे हुए ही घूम रहे है। यह क्रिया अन्त में दुखदायी होगी। यह काया ही मस्जिद है और इस काया में रहने वाला मन ही मुल्ला है। सच्चे मन से ध्यान करो। पुस्तक वेद शास्त्र कुराण आदि पढ़कर कर्त्तव्य कर्म करोगे तो यह जीव मोक्ष को प्राप्त करेगा ।३।
काया तो रतन सरीखी, पहरे तो मोमण कोई । पहर जिण करणी कियो, गुरु म्हारा दाता सोई । दाता सोई पोह पुरो, सुर सभा पहुंचाविये । मानस रूपी फिरै कलिमां, भेद विरला पाविये । दीन और दुनिया को साहिब, विसन करै सो होय सी । पार गिराय पहुंचाय जम्भराय, रतन काया देयसी ।४।
यह दिव्य रत्न सदृश काया मिली है। परन्तु इसको कोई विरला भक्त ही पहचान जानता है। इसका सदुपयोग करता है, इस काया को धारण करके जिन्होनें शुभ कर्म किये है, उन्हें गुरु दाता पुनः काया प्रदान करते है वही काया धारण करके सुपात्र बनता है। उसे अवश्य ही देव सभा में पहुंचा दिया जायेगा। वह इस कलयुग में देव स्वरूप ही है किन्तु मनुष्य का रूप धारण करके भ्रमण करता है। उन्हें पहचानने वाला कोई विरला संत जन ही होगा। वह देव मानव बाहर से दिखने में तो दीन ही होगा किन्तु आत्मा से दुनियां का स्वामी होता है। जैसा विष्णु करेंगे वैसा ही तो होगा। गुरु जाम्भेश्वर जी यहां पर पार उतारने के लिये आये है। हमें रत्न सदृश दिव्य शरीर प्रदान करेंगे ।४।
घर चालो मोमणों, कलि कोयल आई । कलियर कोट तजो, पार पहुंचो भाई । पहुंचो भाई पोह पूरा, छोड़ो मन की दुभांतियां । चौसल के अम्बाराय, कई खड़ी वैकुण्ठियां । देखो दाता देऊ संदेशा, खड़ी दरगे मोमणां । उरबार निहचल कोय नांही, पार चलो मोमणां ।५।
हे भक्तों ! अब वापिस अपने सच्चे घर को चलो। कलयुग में कोयल सदृश मधुर वाणी बोलने वाले हमारे स्वामी हमें लेने के लिये आये है। यहां पर जो कुछ भी हमारे पास धन महल है उन्हें त्यागकर संसार सागर से पार पहुंच जाओ। हे भाई ! अवश्य ही पार पहुंचो क्योंकि इस समय पूर्ण सत्य मार्ग मिल चुका है। मन की भ्रान्तियां दोय मन दोय दिल भाव छोड़ दो। हे देव ! चारों ओर यहां आसपास बाग बगीचों में जहां तहां कुछ जमात और भी खड़ी है जो आपके धाम पहुंचने के लिये व्याकुल है तथा अधिकारी भी है। आप हमें आज्ञा प्रदान करो और उनके लिये संदेशा देवो तो मैं जाकर उन्हें सुनाऊंगा। वे आपके दरवाजे पर ही खड़े है। यहां इस जगह तो अडिग स्थिर कुछ भी नहीं है सभी कुछ परिवर्तन शील है इसलिये हे मोमणों ! यहां से पार सच्चे घर को जाना है ।५।
पार गिराय बसो, जित म्हारो सारंग पाणी । खेवट आप हरी, नरसिंह रूप विवाणी । नरसिंह रूप विवाण वस, देख जीवड़ो परहरै । जीव जुगति पद सुध पूजा, साध मोमणां उधरै । पांच सात नव कोड़ बारा, बोहड़ी नाही फेरवी । अजर अमर करै जम्भराय, पार गिराय बसेरबो ।६।
संसार सागर से पार उतर कर वहां पर निवास करना है जहां पर हमारे सारंगपाणी भगवान विष्णु का आवास निवास है। हे देव ! आप खेवट बनकर हमारी नैया को ले चलो जिस प्रकार से नृसिंह रूप धारण करके प्रहलाद को अपने मित्रों सहित लेकर चले थे। नृसिंह रूप खेवट को देखकर जीव थर थर कांपने लग जाता है किन्तु आपका भक्त साधु जो आपकी भक्ति करता है आपके चरणों की सेवा करता है वह युक्ति जानता है। वह अवश्य ही नैया पर सवार हो जायेगा और पार उतर जायेगा। ऐसे जाम्भेश्वर जी अमर अजर करने वाले है। जीव को पार उतार कर सदा के लिये ही वहां पर बसेरा देने वाले है ।६।