कवि परिचय — आलम जी
आलमजी का जन्म सं. 1530-1610 में अनुमानित है। ये हजुरी कवि थे। जम्भसार में आलमजी की कथा विस्तार से वर्णित की है। इन्होनें अपने जीवन काल में अनेकों रचनाएँ की है। तथा गायन विद्या में बड़े ही निपुण थे। इनके द्वारा रचित 8 साखियां एवं 12 हरजस प्राप्त है। प्रथम जुमलै की साखी इनकी यह प्रचलित है।
आवो मिलो साधो मोमणो, रलि करि जमूं रचाय ।१।
हे साधों मोमणों! जागरण में आओ और मिलकर बैठो, सभी मिलजुल जागरण जमो करो। सुनो तथा दूसरों को भी सुनाओ ।१।
साध सिदक मिलि जोविये, विसन विसन भणाय ।२।
विसन जंपा सुख सांप जे, जम गंजण तै छुटाय ।३।
साधु एवं सिद्धजन मिलकर विचार करके देखो तथा विष्णु का जप करो और दूसरों को भी ऐसी ही प्रेरणा दो। कहा भी है- सिद्ध साधक को एक मतो। विष्णु का जप करने से ही सुख शांति आयेगी तथा यमदूतों की मार से विष्णु ही बचायेगा ।३।
जे बायो सोई लुण्यो, विन बाहया पछिताय ।४।
जिसनें भी ज्ञान ध्यान साधना रूपी खेती की है, फल भी तो वही प्राप्त करेगा। जिसनें खेती की ही नहीं, तो वह क्या फल प्राप्त करेगा, उसे तो केवल पछतावा ही रहेगा ।४।
लूणों चुणों साधो मोमणों, संभल गांठ की जायं ।५।
हे साधों मोमणों! जहां पर भी ज्ञान के कण बिखरते हो वहीं से लुण-चुण करके एकत्रित करो, ज्ञान तो उतम ही होता है उससे परहेज मत करो, कहीं ऐसा न हो कि पास में आयी हुई ज्ञान की गांठ न खुल जाये और जो कुछ भी अर्जित किया था वह भी खिसक न जाये ।५।
काज संभलो बैड़े चढ़ो, भुंयजल ज्यूं लंघाय ।६।
पीछे कुछ करना अवशेष रह गया है तो अति शीघ्रता से पूर्ण कर लो और गुरुदेव ने यह नियम धर्म रूपी नौका दे रखी है, इसी पर सवार होकर संसार सागर से पार उतरना है। गुरु स्वयं यहां पर खेवट उपस्थित है ।६।
भुंयजल लंघै सो उबरै, पहुंचे पार गिराय ।७।
जो भी भवसागर से पार उतर जायेगा वही तो अजर अमर हो जायेगा, उसी का ही मानव जीवन सफल है ।७।
पार गिराय सुख भोगवै, हरि दीदार मिलाय ।८।
वहां परमात्मा के परम धाम पहुंच जायेगा तो अनन्त सुख की प्राप्ति हो जायेगी, हरि का प्रेम वहां पर सुलभ होगा ।८।
फूलो हलवी पाटो कुंचवी, बीजल इधिक खिंवाय ।९।
जां संतां नै नफो हुवै, जीवत जे मर जाय ।१०।
सदा ही चंचल रहने वाला मन जिसे हलवी कहा गया है। यह मन भी साधना द्वारा हृदय रूपी पाटे पर जाकर बैठेगा, वहां पर संकुचित हो जायेगा, चंचलता मिटाकर एकाग्र हो जायेगा तो वह हृदय में प्रफुल्लित कमल फूल पर मन रूपी भंवरा गुंजार करेगा, वही गुंजार ही नाद ध्वनि के रूप में सुनायी देगी, उसे ही बादलों की गर्जना कहा गया है, और जब नाद ध्वनि की गर्जना सुनायी देगी तो दूसरे ही क्षण बिजली की चमक भी दसवें द्वार में दिखाई देगी। यही सभी कुछ जब मन की हृदय कमल में स्थिरता होगी तभी संभव है। बादल में बिजली की चमक एवं गर्जना भी बादलों की स्थिरता पर ही निर्भर करती है। कहा भी है- "हृदय नाम विष्णु को जंपो हाथे करो टवाई" "ईश्वर सर्व भूतांना हृद देशे अर्जुन तिष्ठति" जीवन का लाभ तो उन्हीं संतों को होता है जो इस प्रकार की साधना करके अपने अहंकार को मिटा देते है। उनकी दृष्टि में सर्वत्र हरि ही हरि रह जाता है, मैं पना मिट जाता है ।१०।
जीवत मरै सो उबरै, पहुंचे पार गिराय ।११।
जो इस प्रकार की साधना करता है वही बच पाता है, अन्य तो सभी डूबते हुए नजर आ रहे है। मोह माया से निकल नहीं पाते है ।११।
रतन काया सांचै ढ़ली, ओ ऐह आपा पहराय ।१२।
यह दिव्य काया परमात्मा ने हमें प्रदान की है। प्रत्येक शरीर की आकृति स्वभाव भिन्न-भिन्न है, ऐसा अहसास होता है कि प्रत्येक काया के लिये अलग-अलग सांचे बनाये है, उसमें सुन्दर काया ढ़ाली गई है। उस काया को इस जीवात्मा ने पहन रखा है ।१२।
रतन काया पण पहर कै, हींडोले पण वैसाय ।१३।
हींडोलै पण वैस कै, सहज ही सुरत लगाय ।१४।
किन्तु इस रतन सदृश अमूल्य काया को प्राप्त करके भी यदि हींडोले अर्थात् हृदय से उठी हुई आनन्द की लहरों, उमंगों से परिचित न हो सके तो जीवन व्यर्थ ही चला गया। यदि उस उमंगों की लहर पर बैठ जाये तो सहज ही सुरति परमात्मा से लग जायेगी ।१४।
छल्या कचौला अमि का, सुगुरु प्रसाद पिवाय ।१५।
अति प्रेम सूं विसन जपो, भृकुटि सुरत लगाय ।१६।
अमृत के कटोरे भरे हुए है तथा वह भी अपने पास अति निकट ही है, किन्तु उनकी प्राप्ति तो गुरु कृपा से ही हो सकेगी। सतगुरु ही युक्ति से अमृत पान करवा सकते है। हे साधो मोमणों! अत्यधिक प्रेम भाव से भृकुटि में ध्यान लगाकर विष्णु मंत्र का जप करो ।१६।
जांभजीरो सेवक बोले आलमो, इणि विधि जमो रचाय ।१७।
जाम्भोजी का सेवक आलम कहते है कि इस प्रकार से जमो जागरण रचाओ, अर्थात् सत्संगति करो जो अमृत फल देने वाली है ।१७।