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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह61 / 156

साखी छन्दां की राग धनाश्री-61

एकलवाई आप श्री, जांभेश्वर जीवां धणी

कवि: लखमण जी गोदारा

कवि परिचय — लखमण जी गोदारा

लखमण जी गोदारा जन्म संवत् 1530-1593 अनुमानित। इनके द्वारा रचित साखी पांच छन्दों की प्राप्ति हुई है। ये हजूरी शिष्यों में थे। इनको जाम्भोजी ने जैसलमेर के राज्य में राजदरबार में बसाया था। कुछ दिनों तक वहां रहने के पश्चात् खरीगां गांव में रहने लगे थे। इस कथा को विस्तार से जम्भसार में पढ़ें।

एकलवाई आप श्री, जांभेश्वर जीवां धणी । जाम्भेश्वर जीवां धणी नै, आवियो हरि आप । भगवै बानै विसन आयो, जंपो स्वयंभू जाप । बखत दोय रू करो संध्या, निवण कर लो नाम । शुचियारा साचो धणी, संभरि आयो श्याम ।१।

पवित्र सच्चा मालिक श्री श्याम कृष्ण ही सम्भराथल पर आये है। अबकी बार तो अकेले ही आये है। साथ में अनेकों रानियां एवं अर्जुन आदि नहीं है। इस बार कृष्ण जाम्भेश्वर नाम से यहां पर जीवों के मालिक आये है। स्वयं मालिक स्वामी ही आये है। विष्णु ही भगवां वस्त्र धारण करके आये है और स्वयं ही स्वयं का जप भी कर रहे है। और विष्णु का जप करना बतला भी रहे है। दोनों समय प्रातःकाल एवं सांयकाल में संध्या करना भी बतला रहे है। ऐसे पवित्र आत्मा श्री कृष्ण ही सम्भराथल पर आये है ।१।

सार हुई संसार में, जाम्भेश्वर जुग आवियो । पूरबले परताप, विसन भक्तां पावियो । विसन भक्तां पावियो नै, प्रीत परसां पांव । दुनि आय दीदार देखे, अन्तर अधिक उमाव । दिल मांहि भ्रान्ति मेटी, साधां देशी पार । जाम्भेश्वर जुग आवियो, सुणियो चौचक सार ।२।

अबकी बार इस मरूधर की सुध ली है जिसके फलस्वरूप यहां पर जाम्भेश्वर जी आ गये है। पूर्व जन्मों के प्रताप से ही भक्तों ने विष्णु को प्राप्त किया है। ऐसा भक्तों का सौभाग्य ही कहा जायेगा। जिससे प्रेम पूर्वक चरणों का स्पर्श कर रहे है। दुनियां आती है और प्रेम भाव देख रही है। जिससे उनके भी मन में प्रेम भाव जागृत हो जाता है। अनेक लोगों के मन में बैठी हुई भ्रान्ति को मिटा दिया है। साधु सज्जनों को पार उतार देंगे। इस प्रकार से जाम्भेश्वर जगत में आ गये है, यह बात चारों दिशाओं में फैल गयी है ।२।

सुरग बोले अति दीन, महिमा अंत मेले मिली । जमाती रा झूल साखी, सबद सुर संभली । सबद सुर संभलौनै, परचिया मन पात । उतर दखिण पूर्व पश्चिम, आवे जुड़े जमात । भाव कर मन भेंट धर ही, चौतरे कर चीन्ह । महिमा अति मेले मिली, सुरग बोले दीन ।३।

गुरुदेव ने यहां आकर स्वर्ग मुक्ति देने वाली वाणी कही है। जो भी आकर मिलता है वह महिमा मण्डित हो जाता है। जमाती लोग अनेकों टोलियां बनाकर आ रहे है। यहां आकर साखी शब्द के स्वरों को सुनकर संभल जाते है, कृत्य कृत्य हो जाते है। इस प्रकार से साखी शब्दों को श्रवण करके पंथ की तरफ आकर्षित हो जाते है। पूर्व पश्चिम उतर दक्षिण चारों दिशाओं से जमाती लोग आ रहे है और एकत्रित होकर प्रेम पूर्वक अपनी अपनी भेंट चढ़ा रहे है। चबूतरे चौकी अर्थात् अपने हृदय रूपी चौकी पर गुरुदेव के चरणों की छाप धारण कर रहे है। सम्भराथल पहुंचने से अति महिमा हो रही है। गुरुदेव स्वर्ग का मार्ग बता रहे है ।३।

संता हुवो सहाय, धन्य साधा परस्यो धणी । घृत गूगल महकार, ज्ञान गोष्ठि कीजै घणी । ज्ञान गोष्ठि कीजै घणी नै, सदा शील संतोष । एक मन सूं एक सतगुरु, दीये साधां मोख । दीन तो दीदार परसै, परस लागै पांय । नित्य साधां परस्यो धणी, सतगुरु करै सहाय ।४।

अब लीज्यो अपणाय, इण टाणै सूं मत टालियो । क्षमा करो सुरराय, पत बानें की पालियो । पत बानै की पालियो नै, खिमा करो सुरराय । दावण पकड़यो आप को, निरहारी तोहि नांम । दास लिछमण आस थारी, भूधर आयो भाय । जम जोखो सूं टालियो, सतगुरु करै सहाय ।५।

संत सज्जनों के सहायक हुए है। धन्य है वे साधु जन जो अपने मालिक के चरण स्पर्श कर रहे है। वहां पर घी, गूगल से होम कर रहे है। अत्यधिक महकार सुगन्धि से वातावरण सुगन्धमय हो चुका है। ज्ञान गोष्ठि भी बहुत हो रही है। ज्ञान गोष्ठि में शील संतोष आदि गुणों के धारण करने की चर्चा होती है। जिन्होनें भी एक मन यानि अनन्य भाव से सतगुरु की शरण ली है उन सज्जनों को मोक्ष की प्राप्ति हुई है। अहंकार भाव का त्याग करके अपने दीदार मालिक का चरण स्पर्श कर रहे है। ऐसे साधु जन धन्य है जो स्वामी के संग रहते है। उनकी सतगुरु सहायता करते है। हे देव! अब मुझे भी अपना बना लीजिये, अर्थात् लिछमण को जेसलमेर भेज दिया था इसलिये साखी द्वारा प्रार्थना कर रहे है कि आपनें मुझे ही अपने चरणों से दूर क्यों भेजा, अब तो अपने पास बुला लीजिये, यह जेसलमेर के राज महल में रहने का तो बहाना मात्र ही है। यह सुख सुविधा देकर आप मुझे अपने से अलग क्यों कर रहे है। हे देव! मुझसे कोई गलती हो गई है तो क्षमा करें। आप अपने वचनों का पालन करने आये है और मैं उन्हीं वचनों के अनुसार बारह करोड़ के अन्तर्गत हो हूं, फिर आप मेरे लिये परहेज क्यों कर रहे है। भूल के लिये मैं क्षमा याचना कर रहा हूं। हे निरहारी! मैनें तो आपका ही पल्ला पकड़ रखा है, आपके सिवाय मेरा कोई नहीं है। लिछमणदास कहते है कि अब तो केवल आप की ही आसा है। मुझे तो इस धरती पर आप ही सबसे प्यारे लगते है। इसलिये मृत्यु के भय से बचाइये, सतगुरु मेरी सहायता कीजिये ।५।