साखी कणां की राग जैतश्री-60
सदा न संग सहेलियां, सदा न राजा देश वै । सदा न जग मां जीवणां, सदा न काला केश वै । सदा न काला केश जगतपति, सोच सांमि मुक्ति भया । जीवन अंजरी नीर जैसे, मिलौ माधो करि मया । मया कीजै दरश दीजै, पीजै प्रेम अघाय वै । आनन्द उपजे निस दिना, पीव पडूं तेरे पांय वै । पडूं तेरे पांय प्यारे, जो आया सो खेलिया । वाजिद कह विचार स्वामी, सदा न संग सहेलियां
कवि: वाजिद जी
कवि परिचय — वाजिद जी
वाजिद जी का जन्म सं. 1530-1600 में था। इनकी यह एक साखी उपलब्ध हुई है। ये हजूरी कवि थे। साखी में इन्होनें संसार की असारता के बारे में बतलाया है।
सदा न संग सहेलियां, सदा न राजा देश वै । सदा न जग मां जीवणां, सदा न काला केश वै । सदा न काला केश जगतपति, सोच सांमि मुक्ति भया । जीवन अंजरी नीर जैसे, मिलौ माधो करि मया । मया कीजै दरश दीजै, पीजै प्रेम अघाय वै । आनन्द उपजे निस दिना, पीव पडूं तेरे पांय वै । पडूं तेरे पांय प्यारे, जो आया सो खेलिया । वाजिद कह विचार स्वामी, सदा न संग सहेलियां ।१।
समय परिवर्तनशील है सदा एकरस सभी वस्तुएँ नहीं रहती है। जैसे मित्र सहेलियां सदा ही साथ में नहीं रह पाते है। एक ही राजा सदा ही देश का राज्य नहीं कर पाता है। इस जगत में सदा के लिये जीवन भी नहीं रह पाता है। केश भी काले सदा ही नहीं रह पाते है इसलिये यह बात विचारणीय है कि मैं भी तो सदा ही स्वामी नहीं रह सकूंगा। एक दिन तो मेरी भी यही दशा हो जायेगी। यह जीवन अंजलि के जल की भांति व्यतीत हो रहा है इसलिये अपना सर्वस्व माधव ही है ऐसा मानकर मिलने का प्रयत्न करें। प्रभु एक ही मेरा है इस प्रकार की भावना से प्रभु का दर्शन करें तो प्रेम रस की प्राप्ति हो जायेगी। वह रस आतृप्ति पर्यन्त प्राप्त करें। उस आनन्द ने ही आपके जीवन में परिवर्तन किया है वाजिद जी विचार करके कहते है कि हे स्वामी ! यह संसार की मोह-माया तो सदा साथ नहीं देगी ।१।
मृग तिसना संसार है, पुर पाटण क्या हाटवे । पार पोहती नाव ज्यों, होग्या बारा बाटवे । होग्या बारां बाट हरि विन, सुपन्तर नहीं मेल वै । आठूं पहरि अवटणी ज्यों, कड़ाही तेलवै । तेल अवट अगन सेती, मैं ऐसी अजरी करूं । जामें प्रवीण प्राण प्यारे, कहारे अब कैसी करूं । करूं कैसी जामैं ऐसी, तज्या भूख अहार वै । वाजिंद कहै विचार स्वामी, मृग तिसना संसार वै ।२।
यह सम्पूर्ण संसार तथा सांसारिक हाट, पुर, किले आदि तो सभी नाशवान है। इसमें सुख दिखाई देने वाला तो मृग तृष्णा का जल ही है। जो वास्तव में होता नहीं है केवल दिखाई ही देता है। जिस प्रकार से नौका में बैठकर नदी से पार उतरा जाता है। उसी प्रकार से आपके पंथ को पकड़कर बारह करोड़ पार उतर चुके है। हरि के बिना अन्य दूसरा पार उतारने वाला कौन हो सकता है। यहां पर तो कलयुगी जीव आठों प्रहर दुख में डुबे हुए उबल रहे है जिस प्रकार से कड़ाई में तेल उबल रहा हो। नीचे अग्नि बराबर जल रही है। इस प्रकार की जरना जो जर रहे है सभी कुछ सहन कर ही रहे है। इस प्रकार के दुख में डूबे हुए हे प्राण प्यारे ! हम कैसे सुखी हो सकते है। आप ही कहिये अब मैं क्या करूं। दुख की अवस्था में अन्न आहार का भी परित्याग कर दिया है। वाजिंद जी विचार करके कह रहे है कि हे स्वामी ! यह संसार तो मृगतृष्णा का जल है ।२।
तन तरवर मन पंछियां, लिया बसेरा आय वै । भोर भया जब उड चल्या, योह जग झूठो जानवै । जग झूठा नांह रूठा, दोय दुख कैसे सहूं । रैन अकेला विना बोल्या, विरह शील तामैं बहूं । विरह शील तामैं बहु वोरि, पास न देख्यो पीव वै । लोहुं पानी हो गया, ताला बेली जीव वै । जीव तरसे गिगन बरसे, पीव दिखावो अंखियां । वाजिंद कह विचार स्वामी, तन तरवर मन पंछियां ।३।
यह शरीर तो तरू है और मन ही पंछी है। इस वृक्ष पर आकर मन पंछी ने रात्रि में विश्राम कर लिया है। प्रातः काल होते ही उड़कर चला जायेगा। कुछ दिनों के लिये ही इस जीव ने इस शरीर में निवास किया है जब भोर हो जायेगी अर्थात् मृत्यु आ जायेगी तो इस शरीर को छोड़कर चला जायेगा। यह संसार तो झूठा है, झूठे जगत से यदि नाता नहीं तोड़ा तो मैं दो दुखों को सहन कैसे करूंगा। प्रथम तो पति परमेश्वर स्वामी के वियोग में निपट अकेला हो जाऊंगा तो रात्रि कैसे व्यतीत होगी। दूसरा दुख वियोग रूपी शील में कैसे जीवन यापन करूंगा। वहां तो स्वभाव विरही हो जायेगा क्योंकि पति परमेश्वर पास नहीं है। वहां तो संसार से नाता सम्बन्ध है दोनों सम्बन्ध एक साथ नहीं चलते। विरह की आग में जलते हुए जीव लोहे के समान पिघलकर पानी सदृश हो चुका है आंसुओं की धारा बह रही है। कोई ऐसा सज्जन हो जो जीव को आंखों से अपने प्रिय परमेश्वर को दिखादे तो शांत हो सकता हूं। वाजिद जी विचार करके कहते है कि हे स्वामी ! यह शरीर तो एक तरू की भांति है और जीव ही इस पर बैठा हुआ पंछी है ।३।
योह विरियां बोहरयो नांही, हो हो हो बलि कंटवे । वारी फेरी बलि गई, अंत न लीजै अंत वै । अंत न लीजै दरस दीजै, जीव न दीजै दुख वै । च्यारो दिशा झिकोरियां, झुरै अकेला रूंख वै । अकेला रूंख निस दिन, किसे सुणाऊ रोय वै । शीत ओस सिर पे सहूं, संग न साथी कोय वै । संग न साथी काम हाथी, कृष्ण करि अपणी गही । वाजिद कही विचार स्वामी, यो तिरियां बहुरि नहीं ।४।
यह अवसर बार-बार नहीं आयेगा। बड़ा ही आश्चर्य एवं चिंता का विषय है कि यह बारी भी व्यतीत होती जा रही है। दुबारा आने वाला अवसर चला गया है। इस अन्तिम बेला में भी उस अनन्त परमात्मा की प्राप्ति अवश्य ही करें। हे देव ! अब तो बहुत हो चुका है, और आगे अन्त न लेवो। परीक्षा मत करो। अवश्य ही दर्शन दीजिये। जीव को अब अधिक न तड़पाओ। चारों दिशाओं में भयंकर तुफान आ चुका है कहीं कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। मैं निपट अकेला हो चुका हूं। रूख की भांति अकेला ही विलाप कर रहा हूं। अपना रोना किसे सुनाऊं। प्राकृतिक आने वाली आपदाएँ सर्दी गर्मी आदि सिर पर सहन कर रहा हूं। मेरा साथी आपके सिवाय और कोई नहीं है। कोई संग साथी सत्संग नहीं है परन्तु हाथों में कार्य है जो कृषि कर अपना जीवन निर्वाह कर लेता हूं। वाजिंद जी विचार करके कहते है कि हे स्वामी ! यह अवसर बार-बार नहीं मिलेगा ।४।
वेगा विलंब न कीजिये, जीव किस दिस लागि वै । बोहत गयी थोड़ी रही, असीम ज घटाय वै । जुरा आगे जम पाछै, पिसंण पहुंता आय वै । पिसंण पहुंता आय इसकूं, कीजै चित सवेरियां । काम रूप कुलछणी, पीव तोऊ साध ज तेरियां । साध तेरी आण्य घेरी, दाद इसकी दीजिये । वाजिद कहै विचार स्वामी, वेगा विलंब न कीजिये ।५।
जिस कार्य में भी आप लगे है उसे अति शीघ्रता से पूरा करें। क्योंकि आयु बहुत तो चली गयी है और थोड़ी ही रह गयी है। जब भी समय मिले जागृत हो जाये और देखें। कवि कहता है कि मैं जागृत हूं और देखता हूं कि जो भी बची हुई आयु है वह भी दिनों दिन करके घट रही है। बुढ़ापा आ रहा है। मृत्यु ने बुढ़ापे का पीछा कर रखा है, भयंकर यम के दूत तो आ ही पहुंचे है। यम के दूत पहुंच चुके है ऐसा जानकर चित को प्रातःकाल ही परमात्मा की तरफ लगा दें। यह जीव कामनाओं से भरा हुआ तथा कुलक्षण वाला है। परन्तु इस जीव का स्वामी तो साधु सज्जन है। तुझे भी उस साधु से मिलने के लिये साधु ही बनना होगा। जब यम के दूत तुझे आकर के घेर लेंगे तो तूं उन्हें अपने साधुपने की दाद अर्थात् गवाह या शक्ति बता देगा तो उन क्रूर हाथों से छूट जायेगा। जहां पर हरि की भक्ति होगी वहां पर यम के दूतों का वश नहीं चलेगा। वाजिंद जी विचार करके कहते है कि हे स्वामी ! शीघ्र करें अब अधिक विलंब न करें, मुझे अपने पास ही बुला ले। मेरे दुख को तो आप जान ही गये है ।५।