कवि परिचय — रेड्रोजी
जन्म संवत् 1530-1620 तक अनुमानित है। ये हजूरी साधु थे। जाम्भोजी के पश्चात् रेड्रोजी की ही शिष्य परंपरा चली है। रेड्रोजी के शिष्य नाथोजी थे और नाथोजी के शिष्य वील्होजी थे। इस प्रकार से साधु परंपरा अब तक चली आ रही है। शब्दवाणी जो वर्तमान में प्रचलित है यह भी नाथोजी के कण्ठस्थ थी। नाथोजी ने ही आगे अपने शिष्य वील्होजी को सुनायी थी। वील्होजी एवं उनके शिष्य केशोजी एवं सुरजन जी ने लिपिबद्ध की एवं प्रचार-प्रसार किया। रेड्रोजी की एक साखी उपलब्ध है।
जीवला रे जम्भ अचंभो आयो, अपरंपर हेत कियै हरि ध्यावो ।१।
जीवला रे अजर जरो मनकी मेर चुकाओ, तो अमरा पुर पावो ।२।
जाम्भोजी यहां पर आये है यह महान आश्चर्य जनक घटना है। स्वयं जाम्भोजी तथा उनके कार्य आश्चर्य युक्त है। उस अद्भुत दिव्य अचम्भे से युक्त हरि से प्रेम करो तथा उन्हीं का ध्यान करो। काम क्रोधादि की जरणा करो तथा भावना तेरा मेरा भाव को मिटा दो तो सीधे अमरापुरी वैकुण्ठ धाम पहुंच जाओगे ।२।
जीवला रे सूई के नाकै धागो पोवौ, हरि हिरदै यो जोवो ।३।
जिस प्रकार से सूई के नाके में धागा पिरोते है तो मन की एकाग्रता हो जाती है यदि मन चूक जाता है तो धागा नहीं पिरो सकते उसी प्रकार से हरि को भी हृदय में एकटक दृष्टि तथा मन से देखो तो वहां पर दर्शन होंगे ।३।
जीवला रे यहां चेता दूं पाटे जो मनकी, गांठी गुंढ़ी सह खोवो ।४।
जीवला रे एकर मरीके बहोड़ी न मरिस्यौ, दिल दरियाव सुं धोवो ।५।
यदि मन को सचेत कर दिया जाये कि चंचलता को छोड़कर एकाग्रता की तरफ बढ़ तथा मानसिक दुर्भावनाएँ कपट की गांठ एवं इर्ष्या की गुंढ़ी आदि सभी मिटा दे तो सदा सदा के लिये जन्म मरण मिट जायेगा। इस प्रकार से शुद्ध भावना रूपी समुद्र में दिल को धोकर शुद्ध पवित्र हो जाओगे तो वहां हरि का दर्शन संभव हो सकेगा ।५।
जीवला रे गर्भवास में कवल किया था, जिण रो कांसूं हुवो ।६।
गर्भवास में तुमनें यह वायदा किया था कि मैं बाहर जाकर शुद्ध हृदय से हरि का भजन किया करूंगा उस वचन का क्या हुआ ।६।
जीवला रे वाचा देकर पालो नांही, थे आपे आक नै बोवो ।७।
आप लोग पहले तो वचन दे देते हो फिर उन वचनों को पूरा करने के लिये कुछ भी प्रयत्न नहीं करते तो स्वयं ही अपने हाथों से आम को काट कर आक क्यों बोते हो ।७।
जीवला रे देवजी को दसबंध खरचो नांही, राखो विसन बिसावो ।८।
अपनी कमाई से दसवां हिस्सा देवजी के नाम से दान क्यों नहीं करते हो तथा घर में छुपा कर रखने की कोशिश करते हो क्या विष्णु से छिपा सकते हो ? कदापि नहीं ।८।
जीवला रे खरच्यै लाहो राख्यै तोटो, विवरसी विवरसी जोवो ।९।
दसवां भाग खरच करने में लाभ है तथा जमा करने में नुकसान है, इस सिद्धान्त को बार-बार विचार करके देखो ।९।
जीवला रे ताता थंभा रे गल दी जोली, थे तो करो अस रोवो ।१०।
यहां से जब आगे पहुंचोगे तो गर्म गर्म खंभों से बांधे जाओगे वहां पर हाय तोबा करोगे तथा रोओगे इससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर सकते ।१०।
जीवला रे साच विसन न दोष न दीजै, कारण किरिया न जोवो ।११।
विष्णु तो सत्य सनातन है उन्हें दोष मत दो, यदि आपको दुख आया है तो यह तो आपके कर्मों का ही फल है। अपनी स्वयं की ही कारण क्रिया धर्म देखो ।११।
जीवला रे लाहै कारणै कांय धर जुवो, छैहै कांध अमोवो ।१२।
थोड़े से लाभ के लिये क्यों धर्म छोड़ रहे हो ? यही तो लोभ है। इस प्रकार से लोभ से कमाया हुआ धन तो यहीं रह जायेगा तो क्यों व्यर्थ का परिश्रम करते हो ।१२।
जीवला रै चेहैवा ज मिल ही लाहो, थे विवरस रस जोवो ।१३।
आप जिस वस्तु से लाभ चाहते हो उसमें लाभ कभी कभी ही मिल पाता है यदि मिलता भी है तो वह क्षणिक ही सुख देने वाला होता है इसलिये आप लोग विचार करके रसानन्द देखो कि कहां मिलेगा जो स्थायी हो तथा शाश्वत भी रह सके ।१३।
जीवला रे आज ज मीठो लभ कर लीजै, तिणरो भलकी विगोवो ।१४।
आज ही कर्म किया और उसका मीठा फल तुरंत ही मिल गया किन्तु यह टिकाऊ नहीं है, एक क्षण के लिये ही था दूसरे क्षण में विलीन हो जायेगा ।१४।
जीवला रे मीठे कारण कांय जुल आवै, खारे हाथ संगोवो ।१५।
मीठे क्षणिक फल के लिये क्यों सभी मिलकर आ रहे है और कष्टदायी खारा परन्तु आगामी परिणाम में अमृतमय फल की तरफ से हाथ क्यों खींच रहे है ।१५।
जीवला रे जाट सगोकर जीमण वेसेला, जिणरो मलकर थिगोवो ।१६।
बड़े प्रयत्न से फल की प्राप्ति हुई फिर जाट लोग मिलकर खाने के लिये बैठते है किन्तु तब तक तो वह खारा हो चुका होता है। प्रथम मुंह में रखते है फिर थूक देते है। यह तो केवल छलावा ही था ।१६।
जीवला रे पुरूष कदिसो कलिमां आयो, थे कांय जागंता सोवो ।१७।
ऐसे पुरूष कलयुग में कब आये है जो कड़वे तथा मीठे का निर्णय बताते है। ऐसे अवसर पर भी आप सो रहे हो यानि सभी कुछ जानते हुए भी अनजान बन रहे हो ।१७।
जीवला रे को कहसी सांभलियो नाहि, कान्य न पड़ियो चोवो ।१८।
तुम्हें संभलने के लिये कौन कहेगा। कानों में कोई शब्द की ध्वनि डालने वाला नहीं है ।१८।
जीवला रे सीख दिया सतगुरु समझावै, जम्बू दीप खड़ेवो ।१९।
सतगुरु शिक्षा देकर समझा रहे है और इस जम्बूदीप में आकर उपस्थित हुए है ।१९।
जीवला रे गुरु प्रसादे रेड़ो बोले, हरि चरणां चित लावो ।२०।
गुरुजी की कृपा से रेड़ोजी कहते है कि हरि के चरणों में चित लगाओ ।२०।