साखी छन्दां की राग मारू-58
सांभलि-सांभलि हे म्हारी पदमण माय, सम्भराथल रली बधावणां
कवि: कूलचंद राय अग्रवाल
कवि परिचय — कूलचंद राय अग्रवाल
कूलचंद राय अग्रवाल सं. 1505-1593 जन्म एवं अन्त अनुमानित है। ये उतर प्रदेश के अग्रवाल बिश्नोई थे। प्रत्येक वर्ष दो बार सम्भराथल पर देव दर्शनार्थ आया करते थे। शब्दवाणी प्रसंगों में तथा जम्भसार में इनका उल्लेख विस्तार से मिलता है। इन्होनें गुरुदेव के चरणों में दो साखियां रूपी पुष्प अर्पित किये है जिससे उनकी भक्ति भावना एव कवित्व का भाव उजागर होता है।
सांभलि-सांभलि हे म्हारी पदमण माय, सम्भराथल रली बधावणां । गुरु आयो छै जाम्भेश्वर देव, कलि मां काज उतावला । कलि में तो काज उतावला नै, हरखि ज कृष्ण आवियो । बारां करोड़ी मिलिया जानी, इकविसां रे मन भावियो । चार चौक रची चंवरी, मया करि पहुंचाय नै । वैकुण्ठ साहो मने उमाहो, सांभलि पदमण माय नै ।१।
अपनी माता को सम्बोधन करते हुए कोई व्यक्ति कह रहा है- हे पदम सदृश मेरी मां ! सचेत हो जाओ। सम्भराथल पर बधाइयां बंट रही है वहां पर अपार भक्तों का समूह जुड़ा हुआ है। गुरुदेव जाम्भोजी आये है क्योंकि कलयुग में अतिशीघ्र ही अपना कार्य पूरा करके जायेंगे ज्यादा दिन नहीं ठहरेंगे। कलयुग में अकस्मात ही कार्य हेतु स्वयं कृष्ण ही पधारे है। बड़ा ही प्रसन्नता का माहोल हो रहा है। स्वयं जाम्भोजी आप तो दुल्हा बनकर आये है और अपने साथ में बारह करोड़ बराती बना कर ले जायेंगे। आगे इकीस करोड़ से ले जाकर मिलायेंगे। स्वयं दूल्हा ने यहां पर चार चक में चंवरी विवाह मण्डप बना दिया है। सभी को सूचित कर दिया है। यह सभी कुछ अपनी माया के द्वारा ही कर रहे है। वैकुण्ठ में अपने भक्तों को लेकर जायेंगे। भक्तों के मन में उमंग उठ रही है। हे मेरी पदमनी मां ! तूं क्यों सो रही है। अब तो जाग जाओ ।१।
मेलो मेलो करि करतार, साधां मोमण रे मन रली । साह बूठो छै पच्छिम रे देश, खिवै सवाई कुल्यचंद बीजली । खिवै बीजली झिलो मिलाती, घटा ऊजल संचही । कर धारी अचल आरतो, लाडी खड़ी पंथ उडीक ही । तेरी रतन काया स्वर्ग सोहे, छाड जीव संसार नै । हंसि मिलो मोमण करो इकायंत, मिलसी करतार नै ।२।
हे मां ! साधु मोमणों के साथ में मिलकर भगवान जाम्भोजी से जाकर अवश्य ही भेंट करो। कूलचन्द जी कहते है कि अबकी बार स्वयं परमात्मा पश्चिम देश मरूभूमि पर अत्यधिक प्रसन्न हो गये है जो उदारता से ज्ञानामृत की वर्षा कर रहे है। जहां-तहां ज्ञान की ज्योति बिजली सदृश चमकती हुई दिखाई दे रही है। उज्ज्वल घटा उमड़ करके आ रही है और झिलमिल करके विद्युत चमक रही है अर्थात् क्रिया कर्म धर्म द्वारा उज्जवल आचार-विचार से मानव को पवित्र बना दिया है। जहां-तहां शुभ्र वेश गुण धर्म द्वारा भक्त अलग ही दिखाई दे रहे है। ऐसे महापुरूष अवश्य ही स्वर्ग में पहुंचेंगे। वहां पर स्वागत के लिये अप्सराएं सामने आयेगी और आरती उतारेगी। ऐसे भक्तों की परीक्षा स्वर्ग में होती है। तुम्हारी रतन काया स्वर्ग में शोभायमान होगी। इस शरीर को त्याग करके जब यह जीव जायेगा। इसलिये मोमण भक्तों से प्रेम पूर्वक मिलो तथा एकान्त में बैठकर सत्संग की वार्ता करो तथा ध्यान करो तो अवश्य ही कर्त्ता पुरूष परमात्मा से मिलान होगा ।२।
संभरथल मोमणां जागी पीठ, विसाहित जंभराज आवियो । मेरो मन रातो बिन मजीठ, मोमण होय वीरा विणजियो । विणजो मोमण धर्म बहुविध, छोड़ मन कुबाणिया । वरत अनहद मोख मुक्ता, साच सिदक पिछाणियां । छाडि मायाजाल चाल्यो, जास हिवड़ो निर्मला । जिकर सुणि सुणि थूल परच्या, पीठ जागी सम्भराथले ।३।
हे भक्तों ! इस समय सम्भराथल पर ज्ञान पीठ की स्थापना हो चुकी है इसलिये हे भाई ! भक्त बनकर वहां श्रीदेवजी के पास अवश्य ही जाइये तथा हीरों का व्यापार कीजिये। जाम्भोजी स्वयं व्यापार करने के लिये तथा देने के लिये तैयार है केवल आपको ग्राहक बनकर जाने की ही जरूरत है। कवि कहता है कि मेरा मन तो रंग चुका है। किन्तु ज्ञान प्रेम के रंग में रंजित हुआ है न कि मजीठ के रंग से। इसलिये मोमण बनकर ज्ञान ग्रहण करो। अनेक प्रकार के नियम धर्म को ग्रहण करो तथा कुबाण कुलक्षण कटुवचन आदि को छोड़ दो। अनहद नाद बज रही है उससे आपको परिचय करायेंगे तथा जीवन मुक्त तथा मोक्ष की प्राप्ति का उपाय बतलायेंगे। वहां पर पहुंचकर सच्चाई इमानदारी की पहचान हो सकेगी। जिसने भी मोह माया को छोड़ दिया है और गुरु की शरण में चल पड़ा है उसी का ही मन निर्मल है। गुरुदेव के शब्दों को सुन करके स्थूल मूर्ख लोग भी परच गये है। ज्ञानी बन गये है। ऐसी पीठ सम्भराथल पर स्थापित हुई है ।३।
कलयुग मोमण सुरगा आश, जम्भराय धर्म थापियो । पापां री पाल छोड़ जीवड़ा, मुक्ति काजै गुरु जापियो । जंपो सतगुरु जीव काजै, हर विवाण पठाइयो । गौठि ओसर मिल्यो नांही, ढ़िग चूका भाइयो । सत दे किरतार दिल में, साध मोमण के पगे । सुशील छिव नै खता नाही, पार पहुंचो कलियुगे ।४।
हे मोमण ! इस भयंकर कलयुग में दुखी जीव तो स्वर्ग की ही आशा करते है, केवल सुख ही चाहते है। उस सुख तक पहुंचाने की स्थापना जाम्भोजी ने की है। पापों की पाल यानि पाप मार्ग को छोड़ करके मुक्ति के लिये गुरु के पास अवश्य ही पहुंचे। इस जीव की भलाई के लिये गुरु के बताये हुए मन्त्र का जप करें। आगे हरि स्वयं ही वैकुण्ठ में जाने वाले विमान में बिठाकर आगे भेज देंगे। यदि तुम्हें गुरु के साथ संगोष्ठि करने का सुअवसर नहीं मिला है तो यह बहुत ही बड़ी चूक हुई है। पालन पोषण कर्ता विष्णु तुम्हें सत शक्ति प्रदान करेंगे किन्तु वह शक्ति तो तभी मिलेगी जब साधु मोमणां के बनाये हुए मार्ग पर चलेगा अर्थात् उनकी तरह आचरण करेगा। जो जीव सुशील सुजान है उन्हें तो किसी भी प्रकार का भय नहीं है। वह तो इस कलयुग में अवश्य ही पार पहुंच जायेगा ।४।