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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह57 / 156

साखी छन्दां की राग उडारथा-57

जागो जागो जंबूदीप हुई छै आवाज, सही सौदागर जांभराज आवियो

कवि: कूलचंद राय अग्रवाल

कवि परिचय — कूलचंद राय अग्रवाल

कूलचंद राय अग्रवाल सं. 1505-1593 जन्म एवं अन्त अनुमानित है। ये उतर प्रदेश के अग्रवाल बिश्नोई थे। प्रत्येक वर्ष दो बार सम्भराथल पर देव दर्शनार्थ आया करते थे। शब्दवाणी प्रसंगों में तथा जम्भसार में इनका उल्लेख विस्तार से मिलता है। इन्होनें गुरुदेव के चरणों में दो साखियां रूपी पुष्प अर्पित किये है जिससे उनकी भक्ति भावना एव कवित्व का भाव उजागर होता है।

जागो जागो जंबूदीप हुई छै आवाज, सही सौदागर जांभराज आवियो । आय नै संभराथल लियो छै मेहलाण, विणज करो मेरा भाइयो । विणज तो विचार कीजै, कपट बाण न कीजिये । काच कथिर भगार पर हरि, मन दे हीरा लीजिये । रत्न लाल भण्डार मुक्ता, जोय मांगै सो दिये । ऐसो समरथ साह आयो, चेतकर जीव जागिये ।१।

जम्बूद्वीप में गुरु जाम्भेश्वर जी आये है और धर्म की नाद बजायी है। यत्र तत्र आवाज सुनायी दे रही है। हे भक्तों ! जागो और सचेत होकर दिव्य शब्द को श्रवण करो। हे मेरे भाइयों ! अवश्य ही विणज व्यापार करो। उनसे संपर्क स्थापित करके कुछ लेन-देन करो। यदि विणज व्यापार उनसे करना ही है तो विचार पूर्वक करो अन्यथा वहां कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकोगे। वहां पर कपट का व्यापार नहीं चलेगा। अपने मन में जन्म जन्मान्तरों से बिठाये हुए कथिर जो नष्ट होने वाले है उन्हें त्याग करके गुरु देव से हीरा लीजिये। अर्थात् सांसारिक नाशवान वस्तुएं परित्याग करके हीरा सदृश ज्ञान लीजिये। वहां पर गुरु की शरण में जाओगे तो रत्न लाल मुक्तामणि का भण्डार मिलेगा जो आप मांगेगें वही मिलेगा। जीवन युक्ति मुक्ति दोनों ही वहां पर संभव है। ऐसा सर्व समर्थ व्यापारी जम्बूदीप में सम्भराथल पर आये है। सचेत होकर अवश्य ही वहां पर जायें ।१।

विणजो विणजो मोमण चतुर सुजान, हीरा पिछाण ही । मुरखा मन हठ बिणज न होय, परख नहीं जांण ही । जांणी पारख पंथ पायो, परच पाखण्ड छाड़िये । संसार ममता छोड़ी प्राणी, अमर आसा मांडिये । साह सतगुरु नांव नीवी, प्रीत साटै हम लियो । छाड़ि छन्दां भ्रान्ति परहर, साध मोमण विणजियो ।२।

हे चतुर सुजान ! अवश्य ही हरी की पहचान करके उनसे ज्ञान ध्यान की प्राप्ति करो। मूर्ख दुष्ट जन परख नहीं सकता। प्रथम परीक्षा करें फिर जानकर के पन्थ को पकड़ें और पाखण्ड को छोड़ दें। संसार से मोह ममता को छोड़कर सदा ही अजर अमर होने की आसा करें। साहूं सतगुरु यहां व्यापार करने के लिये आये है। नाम जप का विधान दे रहे है और बदले में प्रेम ले रहे है। कवि कहता है कि ऐसा व्यापार हमनें किया है। छन्द अर्थात् व्यर्थ के किसी के गुणगान कर तथा भ्रान्ति को छोड़कर हे साधों मोमणों ! अवश्य ही उतम व्यापार करो ।२।

किसन चरित हरि माघ, देवजी रा कुण लहै । आज म्हारो साहिब राजा, उदास सोहबती सा बहै । सा बही सोबति सुपह क्रिया, चार चौचक सांभली । कांप्या कायर हीण करणी, मोमणा रे मन रली । साम सरसो सासथ कीजै, मीन जल बिन क्यों रहै । वैकुण्ठ महल मेल्हाण देवजी रा, चरित हरि का कुण लहै ।३।

देवजी ने यहां आकर कृष्ण चरित्र किया है और हरि विष्णु का अनादि मार्ग बताया है परन्तु उसे धारण करने वाला कोई विरला ही सौभाग्यशाली होगा। इसलिये आज हमारे साहिब राजा उदास है क्योंकि देने पर भी संसार के लोग लेने के लिये तैयार नहीं है। इस समय प्रेम से घिरे हुए है जो भी उनके पास आता है उसे प्रेम से ओत-प्रोत कर देते है। प्रथम प्रेम से आनन्दित करके फिर उसे सुमार्ग क्रिया कर्म के बारे में चौकस करते हुए दिखाई दे रहे है। चारों तरफ प्रेम का वातावरण दिखाई दे रहा है, लोग संभल रहे है। जो शुभ कर्महीन व्यक्ति है वे कंपायमान हो रहे है कि हमारी पाप की पोटली भी कहीं उतरवाकर फेंक दी जावे तो फिर क्या होगा। भक्त जनों के मन में आनन्द की लहर दौड़ रही है। भक्त जन तो सरस होकर श्याम श्री विष्णु का साथ कर रहे है। मछली जल के बिना कैसे रह सकती है। इस समय भक्तों के जीवन के आधार देवजी उपलब्ध है। देवजी का निवास स्थान तो वैकुण्ठ के महल है अर्थात् जन-जन का हृदय कमल है। ऐसे हरि के चरित्र को कौन लेगा। कोई भाग्यशाली ही ले सकेगा ।३।

धन्य धन्य सो दिन महूरत, बार बारां इकवीसां मिलै । लंघिया छै भवजल दूतर पार, भव सर भी पलै । पाल भवसर पार जाइये, सरब सांसो भाजही । उत मिलै मोमण दिलो चोखा, अधिक प्रीति उपजावही । श्याम को दीदार दीसै, पाइये मन वांछा मनि । सुरां सुरपति हुवै मेलो, दिहाड़ो सोई धनि ।४।

वह दिन वार मूहुर्त धन्य है जिस दिन समय में बारह करोड़ का इकवीस करोड़ से मिलान होगा। जब ऐसा हो जायेगा तो सदा के लिये भवसागर से पार उतर जायेंगे पुनः इस संसार में नहीं आयेंगे। संसार सागर को मेटकर अवश्य ही पार जाना चाहिये वहां जानें पर सभी प्रकार का संशय मिट जायेगा। वहां पर अच्छे भक्त मोमण मिलेंगे वे लोग अत्यधिक प्रेम करेंगे, प्रेम का विस्तार होगा। वहां पर तो सभी कुछ श्याम का ही पसारा दिखाई देगा। मन वांछित फल की प्राप्ति वहां पर होगी। वहां परम देवता तथा देवाधिपति इन्द्र बृहस्पति आदि से भी मिलन होगा। वह दिन वार नक्षत्र ही धन्य है जिस दिन यह कार्य होगा ।४।