इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।
जीवला जी धन्य महुरत्य धैन्य सु बेला, गुरु झांभेसर आयौ । दोय पख निरमला दील दायमा, विषम पंथ चलायौ ।१।
एतड़ा पापी दोजक नै जायस्यै, आयो विसन ध्यायौ । आसति करि करि नासति करिस्यै, जां सीरि गुन्हौ लीखायौ ।२।
पुल्हण साह पड़ति क काज्य, ठय पुजौ परणायौ । जीवला जी पुल्हण साह अधारा दीन्ही, रामदास वग्य वधाया ।३।
नागौर सु रामदास चड़ीयो, व्रगवन हड़े आयौ । काढ़य तेग गर दोन्य वाही, जीव उतारया भुय थायो ।४।
आ खड्ग आपे खतरी, आपे आप सीझायो । हिंदू तुरक ह कंप हुवा, देख्यौ क्या जुलम कुमायौ ।५।
धन्य तेरी मात-पिता धन्य तेरौ, धन्य औ रामदास जायौ । वकुंठ की पोल्य उघाड़ी, धैन्य ओ रामदास आयौ ।६।
सुरगे कांमैण्य खड़ी उडीकै, रामदास वग्य वधावौ । पांच सात नव खड़ी उडीकै, बारहां साथ उमाह्यौ ।७।
देव वीसन म्हे सेवग थारा, जिण्य रतन भुवण बतायौ । गुरु परसादे नानिग बोल, मीठो दीन सुणायौ ।८।
हे जीव ! वह धन्य घड़ी धन्य मुहूर्त सुबेला जिसमें गुरु जाम्भेश्वर आये है। दोनों पक्ष हिन्दू मुसलमान को निर्मल किया। दिल में दयालु भाव सिखाया। ऐसा विषम विशेष पंथ चलाया जिसमें दोनों पक्ष एक भाव से स्वीकार करे। मानव मात्र की उन्नति हेतु यह बिश्नोई पंथ चलाया है। इतने पापी दौरे नरक में नहीं जायेंगे जिसने विष्णु का ध्यान जप किया है जिन्होनें अपने नास्तिक भाव से गुन्है किये है जिनके सिर पर पाप की पोटली धरी थी उसे नीचे उतरवा दी। इस बात का एक उदाहरण यहां पर दिया गया है। जिसमें रामदास जो नागौर से चढ़कर जीव रक्षा हेतु अपना सिर समर्पण कर दिया था। सामने किसी शिकारी ने तलवार चलायी थी इधर रामदास ने अपने प्राण देकर भी जीव रक्षा धर्म का पालन किया था। जिसे देखकर हिन्दू मुसलमान दोनों पक्षों ने वाह-वाह कहते हुए रामदास को धन्यवाद दिया था कि इस धरती पर जीव रक्षा करने के लिये अपने प्राण भी दे सकते है। ऐसा कभी हुआ नहीं है ऐसा पहली बार बिश्नोई पंथ के पथिक द्वारा देख रहे है। जीव हिंसक ने जुलम किया है ऐसा जुलम आगे फिर से नहीं होने दिया जायेगा। कहा भी है- 'साल्हिया हुवा मरण भय भागा, गाफिल मरणा घणां डरै।' (सबद ११) धन्य है रामदास धन्य है तेरे माता-पिता गुरुदेव को जो धर्म की रक्षार्थ प्राण दिये है। आगामी आने वाली पीढ़ी के लिये प्रेरणा के स्त्रोत बने है। आपके लिये स्वर्ग का द्वार खुल गया है। आगे अप्सराएं आपकी प्रतीक्षा कर रही है। पांच, सात, नव करोड़ देव रूप में स्थित तीन युगों के भक्त आपकी प्रतीक्षा कर रहे है। कलयुग के बारह करोड़ के साथ भी तुम्हें उमंग प्राप्त होगा। कवि नानिग कहते है कि हे देव विष्णु ! हम आपकी शरण में है। आप ही ने स्वर्ग मोक्ष का मार्ग हमें दिखाया है। यह मधुर धर्म पंथ आप ही ने बताया है।