जुल्य चालो मेरो भाइड़ा, इण्य पंथड़ल पीयार । जुग्य आयो जांभेसर राजा, कल्य दसवै अवतार । कल्य दसवै अवतारि संभरथल्य, जांस परापति पायौ । घण नर गंद्रफ बेली, साच सबद सु णायौ । उतर दिखण पुरब पछयम, बागड़ देस सु हावौ । सुर तेतीसां हुवै मीलावौ, जुल चालो पंथ पियारो ।१।
हे भाई लोगों ! इस जाम्भोजी द्वारा बताये हुए बिश्नोई पंथ पर सभी लोग साथ मिलकर चलें और इस पंथ से प्रेम रखें । इस कलयुग में दसवां अवतार जो अंत में बताया था वह अभी जम्भेश्वर जी के रूप में आये है । जिसका भाग्य-सुभाग्य होगा वही प्राप्त कर सकेगा । अनेक लोगों को तथा गन्द्रफ, सुर-नर आदि सभी को श्रीवायक सुसबद सुनाया है । चारों दिशाओं में विशेष रूप से बागड़ देश में शोभायमान हो रहे है । तेतीस करोड़ देवताओं से इस देश के लोगों को मिलाने के लिये यहां पर आना हुआ है, इसलिये आपके लिये यह सुपथ बताया है । इस पर मिलकर चलें तो आप ही उन तेतीस कोटि देवताओं से मिल जाओगे ।१।
मोख दीय झांभेसुर राजा, विसन जंपौ मन्य साधौ । मोह कह मेरी आंगल्य मन्यसा, हीयड़ बंधण गाढ़ो । हीयड़ बंधण गाढ़ौ गहि करि, ओह मन रीधौ ग्यानै । गुरु अचंभौ सुरनर बेली, हरे सुं जलमै नीधाने । ग्रभवास कवल कीयो थो, वीसन नांव जे कहीय । अब होय कस्ट महा दुख भारी, मोख मुगति घरि जाइय ।२।
विष्णु का जप करो प्यारों, यही जप बताया है, उसी जप से जम्भेश्वर राजा मोक्ष मुक्ति प्रदान करेंगे । आगामी पार उतरने की शुभेच्छा से गुरु देव की शरण ग्रहण करो । हृदय रूपी हवेली में भगवान को बैठाओ और आरती करो, वही तुम्हें भवसागर से पार उतार देंगे । सतगुरु अचंभे के रूप में आये है । सुरनर सभी जिनकी कीर्ति गाते है, वे हरि यहां अवतार लेकर आये है । गर्भ में हरि से कवल किया था, उस कवल को अवश्य ही पूरा करो, भूलते क्यों हो । इस दोजक जन्म मरण संसार के दुख से मुक्त होकर अपने सच्चे घर मोक्ष मुक्ति को प्राप्त कीजिये, इस समय यह सुअवसर प्राप्त हुआ है ।२।
बारां नै पुंहचाव सतगुर, झंभ सही सुं वुठौ । अलख चत्रगुंण आसण्य बठौ, हंसि मुखि बोल मीठौ । बोल मीठौ थल बइठौ, जंबु दीप मंझारी । आप सुसाहेब कवले रावल, आपे कीसन मुरारी । एकलवाई थल सीरय आयौ, बागड़ देस सुहाव । कोड़ि इकवीस वैकुण्ठय पहुंती, बारा नै पुंहचाव ।३।
बारह करोड़ जीवों को पार पहुंचाने के लिये यहां सम्भराथल पर आकर सतगुरु के रूप में विराजमान हो रहे है । वही निराकार अलख चतुर्भुज सर्व गुण सम्पन्न यहां पर आसन लगाकर बैठे है । यहां पर जिज्ञासु जनों की शंकाओं का समाधान अपनी नीजी मधुरवाणी से कर रहे है । थल सिर पर बैठकर मधुर सत्य प्रिय हितकारिणी वाणी बोल रहे है, इस जम्बुद्वीप भरतखण्ड बागड़ देश में यह अलौकिक चरित्र हो रहा है । आप ही साहिब पूजनीय कमलापति विष्णु, आप ही राजा, आप ही कृष्ण मुरारी के रूप में आये है । इस बागड़ देश को शोभायमान करने के लिये इस बार अकेले ही आये है, लक्ष्मी आदि को साथ लेकर नहीं आये है ।३।
पार गिराय वसेरो कहीया, नर निरहारी आयौ । च्यारि चहुंचकि फीर दुहाई, नींद झबकि जगायो । नींद झबकि जगायो मोमिण, न्हांणौ न्हांणे करंता । एक मन्य एक चित करे बंदगी, कंवला ज्यौ विगसंता । मुख माण्यक अलीयो मत भाखौ, बोहड़े न होई फेरौ । जलम जलम का पछतावा, चुक द्यौ गिराय बसेरौ ।४।
तीनों युगों में प्रहलाद के बिछुड़े हुए इकवीस करोड़ तो अब तक वापिस अपने घर विष्णु के लोक में पहुंच गये है, किन्तु बारह करोड़ अब भी नहीं पहुंच पाये है, उन्हें पहुंचाने के लिये नर होते हुए भी निरहारी के रूप में यहां सम्भराथल पर बागड़ देश में आये है । चारों दिशाओं में दुहाई जय जयकार होने लगी है । गहरी नींद में सोये हुए को झटिति जगाया है । एका एक जागृत होकर नींद टूटने पर चारों तरफ दौड़ने लगे है । समय पर पहुंचने की लालसा जागृत हुई है । एक मन एक चित होकर भगवान विष्णु जाम्भोजी की वन्दना करने लगे है, संध्यादिक शुभ कर्म करने लगे है । इस प्रकार से वन्दना करने से सूर्योदय होने पर जिस प्रकार से कमल विकसित होता है, उसी प्रकार से प्रफुल्लित हो रहे है । हे मानव ! इस प्रकार के परम देव यहां पर आये है, उनके प्रति मुख से निद्या के वचन नहीं कहो, यह अवसर बार बार मिलने वाला नहीं है । अनेक जन्मों में भटकते हुए यहां तक पहुंचे है, पीछे कुकर्म सुकर्म जो भी हुआ उस पर पछतावा करके आगे का नवीन जीवन प्रारम्भ करे, अवश्य ही पिछले पाप निवृत हो जायेंगे । गुरुदेव तुम्हें सद्गति प्रदान करेंगे ।४।