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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-103

अब ज चलो रे लाल मधुकर, न रह्यो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

अब ज चलो रे लाल मधुकर, न रह्यो

रहें तो रहणो न होय, एकण सुकरत बाहरयो

अवर न अपणो कोय मधुकर न रह्यो । टेर ।

कूड़ भरोसो कुटुम्ब को, काची तूं न कमाय

जब जम की फांसी पड़ै, काहूंतै सरै न काय ।

जहां जम पहरा दिया, मूरखां पकड़ बैसाय

कूवे केरे कुंभ ज्यूं, गल बंधियो आवे जाय ।

लाल सुरंगी बाड़िया, फूल फलि फलियां

जिनके बीच नीपनियां, अति अल बेलड़ियां ।

पान फल फूल सुगंधियां, एह गुण बेलड़ियां ।

चल मधुकर उन देसड़े, मन माने रलियां ।

इण कुमलाण पोह पसारि, बेठो जेखे मांहि

सत सुकरत पोह पसारयो, कुंवल कुंवल विगसाहि ।

लाल सुरंगी गोरियां, सजण लियो उर लाय

विसनु भगत मन भावतां, भंवर रह्या रंग लाय ।

सहज मंडल जित धामकही, भाजै भरम भीलिया

अमी कचोला वै पीवै, भाव सूं फल फलिया ।

केल करै काम केदलां, कंवल वदन विगसाय

अनहद रिमझिम करै, भंवर भगत भणकाय ।

होद सरोवर नूर तट छल्यो, हंसा करै रे किलोल

चल मधुकर उण देसड़े, भाजे मन री भोल ।

मधुकर अब संभल तूं, सुकरत पाखड़ियां सोई

सोई दरसण म्हारै श्याम को, दीसै आंखड़ियां ।

मधुकर अब सांभल्य तूं, काट चल्या जम फंद

अपणे प्यारा कै कारणै, ज्यों मिल करां आणंद ।

चल मधुकर वहां देसड़े, जहां अपणो नहीं कोय

जिण खंड सूर नहीं ऊगवै, मूवा न सुणियो कोय ।

अच अमृत अति नांव रस, मन मधुकर होय सुरंग

उड 'आलम' मधुकर भंवर,मिल्यो गुरु जंभ अचंभ ।