प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी
साखी-102
पृथ्वी का थामा पड़या, लोवी लांप की औट
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
पृथ्वी का थामा पड़या, लोवी लांप की औट
जंभेश्वरनै छोड़ कै, दीवी मुसाण धोक ।
मड़ी मुसाणां सीतला, पूजै कर कर कोड
जीव पड़ैलो नारगी, जम कूटैला भोड ।
गोगो पूजै प्राणियां, भादरवै के मास
पकड़ भुजा जम कूटसी, धर्मराज के पास ।
पड़ा बंचावै भील सूं, ऊभा बाळै तेल
जमराजा हंस बोलिया, तूं दो दिन करलै खेल ।
नेम धर्म सब छूट गया, दया गई सब ऊठ
जमो दिरावै ढ़ेढ सूं, गई हियै की फूट ।
ढ़ाढी डूमानैं दान देवै, लेवै माजनो पाड़
जूंणी पावै भूत की, ऊभो सुणावै राड़ ।
गउवां रा गौवा रोकै, आडी छपावै बाड़
विश्णाइयों विष्णु भणौ, और दीजे सब ताड़ ।
जंभ गुरु हीरा विणजिया, कियो बैकुंठै वास
'ऊदो' बोलै वीणती, मैं थारे चरणां को दास ।