साखी-101 कणां की राग-मल्हार
मेरे मन हुवो हुलास, संभराथलि जाइयै
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
दोहा
सो वर्ष हरि की भगति करे, एक दिन धियावै आण ।
सौ अपराधी जीव है, पड़े चौरासी खाण ।।
आन देवनै धोकतां, गयो जमारो हार ।
जूंणी पावै पसु बैल की, ऊभौ बिकै बजार ।।
एवाड़ै की खेजड़ी, चढ़ी दुष्ट के हाथ ।
ना तुलसी तन ऊबरे, ना कोई घाते घात ।।
मेरे मन हुवो हुलास, संभराथलि जाइयै
संभराथलि जाइये खरच नांही, बीच अमावस कीजियै ।
उतारि गहणों होय लहणो, विलसि लाहो लीजियै
काहे का मैं करूं दीपक, काहे केरी बातियां ।
काहे का मैं घिरत छालूं, जग छमासि रातियां
सोने का मैं करूं दीपक, रूप बाती छलाइयां ।
सुरह गऊ का घिरत छालूं, जगौं छमासि रातियां
संधिा होय करि जगो दीपक, दासि हूँ मै तेरियां ।
अपणे धाणी सूं सारि खेलूं, कला राखो मेरियां
प्रबल ता दोय चीर उतरया, सोनै तार छलाइयां ।
सोई पह??? धाण चौक बैठी, इंद देखण आइयां
कह 'आंछरे' करौ करणी, पारि पहुंचौ भाइयां ।