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साखी-100
दीन मीठो मेवो, जुग कंरि देखो खारो
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दीन मीठो मेवो, जुग कंरि देखो खारो
ज्ञान अमृत मेवो, मोमणां दीन पियारो ।
झूंठ चोरी अरू झगड़ो, कहर क्रोध निवारो
क्षोहिणी दल करूं क्षीणा, वाद अरु अहंकारो ।
छोड़ कर मेड़ी मंडप, वेहि गया संसारो
दूजा कोई न रहसी, जब आवै जम हंकारो ।
बै बाग बाड़ी कांय हरिया, छाडि कर पधारो
जाणो छै अब अकेलो, अब कांय साथ पछितारो ।
दूजा कथन नाहिं मानो, धर्म कांय निवारो
रंग पाह उतरजा, दुनियांनै रच्यो षसारो ।
पोह अलगो मेलै लो, बिच कर घोर अंधियारो
वे तो अलगा रहिया, जांको तकै था लारो ।
सोई पर पहुंता, जांको न थो लिगारो
'दीन' अमृत बोलै, देवजी पार उतारो ।