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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-99

साच तूं मेरा भाई, अवर न दूजा कोई

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

साच तूं मेरा भाई, अवर न दूजा कोई

जिण या सृष्टि उपाई, सृजणहारो सोई ।

साचा सेती सन्मुख, दुमना सेती दोई

साच कमावो साचे पावो, साचा सन्मुख होई

खालक हूँता छानै, कित छिप कीजे चोरी

भगवतनै सब सूझै, गढ़ दरवाजा मोरी ।

मेड़ि मांडपा किण रा छै, ऐ बहण अर भाई

सब देखता चाल्या, काहु की कछु न बसाई ।

हंसा उड चले जब, बेलड़िया कुमलाई

हंसा उडण की बारी, सुक्रत साथ सगाई ।

किण ही सुगरै भद्रनै, बांधी सत की पालि

आवैला जब वोह खोजी, लेगा खोज निहाली ।

कोड़ि पांच पार पहोंता, जांकी धार करारि

कोटि सात पर पहोंता, हरिचन्द सा शुचियारी ।

कोटि नव पार पहोंता, वार बारां की आई

शाह सही सूं आयो, थल सिर एकलवाई ।

निगुर्ण रूप निरंजन, अलख न लखियो जाई

दीन 'ताज' दीन बोले, जंभ थारी शरणाई ।