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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-98 कणां की

जी हो । टेर ।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

विण दिन्हां कल एह भील ज्यूं भुवै भिखारी।

कांधे पासे छाज हाथ सिरी धणक बुहारी।

तन सीना बसत रहणे धिग बोझ सिरो सहे कुपाली

काया सदा कुचोल नीर नहीं देख पखालो।

पगै जुड़े पाणही वे रिण वासरी साथरी पड़ी रहे।

विशन भक्त कील्हो कहे बिण दिया फ़ल ऐ लहै।।

जी हो । टेर ।

मिलो जमाती और गुरु भाई, जां मिलियां दिल खुलै

खुलै सकल म्हारा सतगुरु बोल, दिल ताला दिल खोल ।

टाके तोले देवजी रतिये माशे, तुल चड़ि आप केसा है

बड़ सौदागर जंभराज लालड़ीयो, हीरालाल वेशा है ।

दशबन्ध खरचो गुरु को कंवल संभालो, जो साहिब के मन भावौ

हरख सुर मिलै नौरंगी, उत पायल कोड रचावौ ।

सुर तेतीसां म्हारो मेलो करावो, नूरे नूर मिलावौ

होद सरोवर को म्हानै इधक उमाहो, नित होद सरोवर न्हावौ ।

रतन काया मिलै नवरंगी, बहुड़ि न इण खंड आवौ

सुर तेतीसां म्हारो वास करावो, पटो अमर लिखावौ ।

संभरथलि सतगुरु प्रकास्यो, कथ केवल ज्ञान सुणायो

हम गुनेही गुरु म्हारो पूरो दाता, गुन्हो मफ करायो ।

कथ परमोधा ‘गुणदास’ बोलै, आवागवण चुकावौ ।