साखी-97
दीने जागो दीने जागो, ओ गुर परगट आयो
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दीने जागो दीने जागो, ओ गुर परगट आयो
संभरथलि सतगुरु प्रकाश्यो, चौहचक आण फिरायो ।
गाफल भूल रह्या भोलावे, करणी साध चिताया
गाफल थूल अभेद मुरखा, क्यों परचे परचाया ।
जां गुरु न चीन्हो पंथ न पायो, अहल्यो जनम गुमायो
करणी हींण कुचील कुबधी, मिनखा रतन गुमायो ।
रह निरंतर नर निरहारी, भल तीरथ निज बाणी
खुधिया तिसनां निद्रा नांही, न पीवे गोरस अँन पाणी।
सुरगांपुर का माघ बतावे, असड़ा लहो रे बिनाणी
सतगुरु नींदै देवल बींदै, धोकै काठ पखाणी ।
तीरथ न्हावे पिंड छलावे, जोय जोय नीर निवाणी
स्वरगांपुर का माघ न जाणे, भूला भुंवै इवाणी
अश्वपति गजपति जातां दीठा, कोटां रा सिरदारा
ते राजिंदर जातां दीठा, चिंण चिंण बंक द्वारा ।
जां री आण दुहाई फिरती, छत्रं सिर छत्र धारा
धंधो करतां जंवरे मूवा, पड़या रह्या पसारा ।
सुर तेतीसां सूं कर मेलावो, उमाहो गुरु अपारा
बीणतड़ी ‘ऊदो’ बोले, सेवक विष्णु तुम्हारा ।