मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह272 / 157
प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी

साखी-97

दीने जागो दीने जागो, ओ गुर परगट आयो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

दीने जागो दीने जागो, ओ गुर परगट आयो

संभरथलि सतगुरु प्रकाश्यो, चौहचक आण फिरायो ।

गाफल भूल रह्या भोलावे, करणी साध चिताया

गाफल थूल अभेद मुरखा, क्यों परचे परचाया ।

जां गुरु न चीन्हो पंथ न पायो, अहल्यो जनम गुमायो

करणी हींण कुचील कुबधी, मिनखा रतन गुमायो ।

रह निरंतर नर निरहारी, भल तीरथ निज बाणी

खुधिया तिसनां निद्रा नांही, न पीवे गोरस अँन पाणी।

सुरगांपुर का माघ बतावे, असड़ा लहो रे बिनाणी

सतगुरु नींदै देवल बींदै, धोकै काठ पखाणी ।

तीरथ न्हावे पिंड छलावे, जोय जोय नीर निवाणी

स्वरगांपुर का माघ न जाणे, भूला भुंवै इवाणी

अश्वपति गजपति जातां दीठा, कोटां रा सिरदारा

ते राजिंदर जातां दीठा, चिंण चिंण बंक द्वारा ।

जां री आण दुहाई फिरती, छत्रं सिर छत्र धारा

धंधो करतां जंवरे मूवा, पड़या रह्या पसारा ।

सुर तेतीसां सूं कर मेलावो, उमाहो गुरु अपारा

बीणतड़ी ‘ऊदो’ बोले, सेवक विष्णु तुम्हारा ।