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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-112 रंगीलो-राव उमराव

अब मने खरोउमाहो रंगीला पार को,चालो ज्यों रतनगढ़ जाय

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अब मने खरोउमाहो रंगीला पार को,चालो ज्यों रतनगढ़ जाय

रतनगढां री जोत झिलमिलै, झिलमिल बीज खिंवाय।

सो गुरु प्रहलादो मिल्यो, सो गुरु हरिचंद राव

सो गुरु मिलियो पांचे पांडवे, जंभ मिल्यो सत भाय।

जींह नूर मुहमद ऊपनौ, इंह गुरु ओही नूर

भल प्रापति भगतां मिल्यो, जाणे दिल मां ऊगो सूर।

दिल भगता दीपक ठयो, कर गुरु भगवां भेख

मानखां रूपी महमाण, मिलियो आप अलेख।

एक लाख असी हजार पकंबरा, दीन महमद आस

बाबा रावल हाजी रतन, खुबाज खीदर अलियास।

चरित देवां रा कुण लहै, कुण लहै किसन रा माघ

अपरंपर बिण कुण कहै, सोवन मंडल री थाघ।

तिहुं जुग दिसां हुला फिरया, बाड़े विछुनां

गुरु शब्दे रिझाविया, नीपना निमुना।

तब छुटा अब समह्या सतगुरु आयो भाय

पार पूरबली दाखवी, मीरांजी लिया मिलाय।

फूंक कुन्याव जका कुबख्या तजी, लीवी करणी छाण

बाह बाड़ाणी बोरड़ी, ऊघड़ी धुरली पिछाण।

के तो मात लोक के चोखले, कै अंबाराय बैंकुठ

आशा पूर्ण अभिमान, मिलसी गुरु सूं तूठ।

नफर जांभाणा हंस गति, आह वांह एका आरेख

असुरां ही तै सुर किया, लाधी गुरु पारेख।

क्रिया कमाओ ताखरी, करणी न घातो हेल

श्याम संबाहो आपाणां, कर तेतीसां मेल।

श्याम समाहो पोह कियो, तोड़यो अविश्वास

लोक विसन कोउछ रंग्यो, मांडि अमरगढ़ वास।

मेरे बाबल बताई बाटड़ी, तांह बाटड़िया बलिहार

भगत परापत हुवै पुलै, मिले साहिब को दीदार।

पांच वखत कर बंदगी, रोजा राखो तीस

देवद सुध छूटै नहीं, सहिये बिसवा बीस।

खर निवाजां न करै, ते आकी संसार

अहरण लोह सिंघाण ज्यों, घणी सहेसी मार।

परदेशी परदेश मां, कूड़ा करै ढिमाल

तूं माड बढ़ाहियै, थारै संग रहै जम जाल।

जंवर कुण न गंजिया, इण खोटै संसारि

चाल सुहावै देशनै, तूं हंसा पंख संवारि।

हंसो दोराई छो फिरै, इण सरे ढकै न पीवत

ज्यों सर देख भणहणै, सो सर मने न वसंत।

आडो भुंयजल अथघ, अदयावणौ पहलौ पुरि वहंत

भेदी भुयंजल ऊतरै, मुरखा मांहि रहंत।

रंगीलो फिरै जो उनमनुं, बांझ नहीं रिंवाण

भुंयजलि यो अदयावणो, साथीड़ा दूर मेल्हाण।

घरि घंघल अबरे घणा, विखमी वाट वहंत

सुरा होयसी सबहै, कायर कीर पड़त।

जम पासी पग पगि ठबी, धरणी न जाई पांव

सतगुरु गति छै उबरण, तूं सहजे सहज समाय।

सौदागर सौदो करी, औगुण है जो निवार

कर सुकरत गुण गांठड़ी, इम लघै सज्जन पार।

क्षमा दया शुचि साच तूं, सत व्रत शील संतोष सुभाव

नाम विसन के विलंबना, हंसा तूं पहर सनाह।

सत शब्द जे मानिये, धारातीर्थ न्हाण

धर विवंग जे पेसिये, बिसन कर आसान।

मोमण जीवत मरै, रूघा आगल जेह

जानै अडीकां नही, चालै गुरु वचनेह।

जीवण थोड़ो वित घणो, सतगुरु दियो बताय

रतन काया बुट ऊपरै, सुगरा मोमण लिये उचाय।

छोड़ क्रम नीहक्रम हुवा, चाल्या सुसंग साथ

सांभल जीवड़ा गुरु कही, मुकती खेत की बात।

जिंह खंड सूर न ऊगवै, मूवौ न सुणिये कोय

चाल सुहावै देशनै, नित अजरांवर होय।

देश सुरंगो पारको, मोमण मीत बसाय

अषेषैण वर कामणी, बैठा केल कराय।

पारगिराये जन बसै, जां नरां ऐसा नवेस

अजर अमर चढतो कला, नित नवला वेस।

विसन भगत जां मन बसै, ओ देखण वा चाव

चतरंगी चढ महलां खड़ी, हुरां लेह हुलाह।

करता नै कामण कहै, अरज सुणो म्हारी श्याम

कलजुग मां करणी करै, आणीजै इण ठाम।

वाबल पूछां आपणो, विहरण वाले वेस

सेण संगोटा मेल नै, जींह तीरू साम नरेश।

सहीयां श्रीरंग वीनवै, होम न हुलहुलियां

नोरंगी निरखी निकंटियां, उदबुद पुंतलियां।

सदां सुरंगी कामणी, बरसां सदा ज वार

जुगे जुगंतर जामती, कंवरां वर्ष अठार।

अति कुंवल सुन्दरि भली, सुन्दरि वजे सुजाण

लील करै लाडे लुडे, हवद सरोवर न्हाण।

नारी कुंजर पहरे कामणी, षीरोदी कंवर पहरंति

अमी कचोले वो पीवे, गुरु परसादे रमंति।

सहजे मां दल जीत धमके, बाजे अनहद वीण

नोरंग वाणी तन रतन, साध भगति लौ लीण।

कोड छमासी जीत पड़ै, रंग रावल उदमाद

घण हरि मंगल गावियो, विसन तणै परसाद।

चत्र चटका दे गया, देव सुरगे खड़िया

हुंसनाके हुंस पुगियां, मन महल चड़िया।

उमाहो मन मोमणां, चितारियो सनेह

हरखे सुर घर आंगणै, हरि ज्योति बूठा मेह।

पान फूलां गहगही, नरां सुरां सुवाई गेल

सुरगे सोरंभ अति घणी, आंगण नागरबेल।

जित तारा चंदा नित थिया, राति दिवस तां नांहि

उडण खटोला नित नुवां, आनन्द ठांवो ठांहि।

काया अनती अनंत गुण, जे थे ताव न सीव

मनसा फल वां जीमजै, जीवी जरै जीव।

रतनगढ़ रलि आवणो, जे थे अनंत बधाव

सैण सगोढा साधु रसिया, हुवै दीदार पसाव।

रतनगढ़ और रतन जन, रंग रस रतन हिंडोल

उमाहो मन मोमणा, विसन माने मन की भोल।

फूलो हलवी पाटो कुंबली, काया प्रेम हंसावै

ज्योत में ज्योति मिलावणा, नित खोजै न छांहवे।

साजनियां अग्नि न दाझही, न उडे बाय बाय

खड़ग धारा नहीं तूटही, ज्योति मं ज्योति मिलाय।

उदगार केवल कुंवल, ओजू मंडल आथ

सिधपुरी मां खेलिया, अनंत सिद्धा के साथ।

मिले पियारे सजनां, सोझै सुजाण

चाल पियारे वेह देसनै, ज्यों आपां रमाण।

लाड कोड रो अंत नही, रंग रस रूप अछेव

हेत बुद्ध विगसत कला, सरब सिधां सग देव।

जैसा गुरू आखर तिसा, फरमाया बड पीर

प्रेम पियो ज्यों पर वघा, उड पहुंचा गिगन गहीर।

गिगन गहीरे गेब झरै, आलमा अनंत विवेक

वह रतनाली जोति मां, रल मिल हुवों ज्यों एक।