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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-113 कणां की - राग धनाश्री

हम परदेसियां हो जी, ओ देसड़लो बिगाणो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

हम परदेसियां हो जी, ओ देसड़लो बिगाणो

साथी म्हारा पार चल्या, हम रहे पछिताणो।

कहं का मात पिता सुत भाई, कहं का पष परवारा

कहं का मेड़ी मंडपा, कह का अै घरबारा।

सांई का मेड़ी मंडपा, अलख तणा घरबारा

म्हे तो छोडि चालस्यां, ये झूठड़ला घरबारा।

म्है तो बोहहिं न आयस्यां, इण खोटे संसारा

आगे तिलकण पड़िया, पंथ खांडे की धारा।

आगै आगै जीवड़ो, पीछे है जमराणो

साहिब लेखो मांगसी, जीवड़ो ओ डराणो।

लेखो देणो - सहज छीजै, करणीजै कमाणो

सत सुकरत की नाव करि, करिवे पार पयाणो।

आप धर्मराज होयसी, आपो ही सुरराणो

आपो आप वांचसी, शास्त्र वेद पुराणो।

तेतीसां सूं मेल होयसी, चुकै आवाजाणो

उदो बोलै वीणती, सेवक सत्य जांभाणो।