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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-114

विज्ञानी आतम थके, ओलोच्यो मन मांय

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विज्ञानी आतम थके, ओलोच्यो मन मांय

जां जां जुग मां जीवणो, ते दिन दुख में जाय।

सिरे मतो खोखर कियो, झड़ै न जोई काय

पंथ सतगुरु को लाजवै, जे कोई इण परिथाय।

खींवणी धनि धनि तोहि नूं, नेतू नैण सधीर

राह कारण रूंखा ऊपरै, वां सोंपिया सरीर।

बन संघारयो भाटियां, कुबधी कागा जोय

जिण ऊपर मोटो खड़यो, स्वर्गे पहुंतो सोय।

खोखर नै मोटो कहै, नहचै राखो चित

तज काया जित जाइये, जहां सुख बना नित्त।

पहले नाम श्री विष्णु को, सिंवरू सिरजणहार

जिण ओ पंथ चलावियो, खरतर खंडाधार।

बिश्नोई वसै तिलवासणी, संतलोक सुर जाण

राह चलावै सतगुरु तणों, मानै गुरु की काण।

जपै नाम विष्णु को, खरतर क्रिया सूर

राखे रूंख सुभाव सूं, नगरी इधिको नूर।

खेजड़ले किरपो बसै, भाटी गोपालदास

संक न मानै किरपो देव की, वन को करै विणास।

बाढे रूंख सुहावणा, किरपो करै सिंघार

आई खबर जमात में, सर पर हुई जे सार।

जमाति आलोचिया, मरणा इण परिथाय

इण अवसर चूको मती, नेकी रहे न काय।

पांचो पीथो परगटयो, नगरी मां सिरदार

चालर खेजड़लै गया, भाटी के दरबार

पोह फाटी पगड़ो हुवो, संता सारे न्हाण

शूरवीर अब कर गहो, जलदी बाण कृपाण।

पहलि मूंही खिंवणी खड़ी सत सूं घणो करार

विष्णु भगत मोटो खडयो, गुरु सूं हेत पियार।

इंहि ऊपर नेतू खड़ी, चाली जनम सुधार

स्वर्गा बेड़ो ऊतरयो, जिण चढी पहुंता पार।

हरखि सुन्दरि मन मोहणी, सुर पुर साध सुजाण

जामण मरण जहां नहीं, सुख अधिकेरा जाण।

वील्ह भणे गति सांभलो, साधां तणा बखाण।