साखी-115
मीठा तो बोलो भइया निंव खिंव रे चालो,
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
आतम इन्द्री पांच धूपले ध्यान धरीजे।
ज्ञान धिरत मन पोहप चित चरणां मती लिजैं
परखो पुरूष खमाधी लीना, नित नाम रिरंजण।
जथा जुगती पं-खाण तथा शिवरण मन मन्त्रण।
सन मुखो सहाय सती लील जिभ्या लिलंग पारी।
दया दरशण धोक धुन्य तो प्राणी पावक होम करी ।।
मीठा तो बोलो भइया निंव खिंव रे चालो,
ना तोड़ो गुरु सूं नेहा
मोमण हुवे सो बीरा, आपो रे मारें, अवरां मारण केहा।
मोमण हुवे सो बीरा टूटी रे सांधे, दुसमण घातैंला बेहा
भरी सभा में बीरा पड़दो रे पाड़ै, दौरै जेला दुशमी एहा।
हंसा तो हंदी बीरा टोली रे आवै, सरवर करण सनेहा
हंसा चलो बीरा पिंड रे पड़ेलो, बास कलिअल केहा
कसी कुदाला ले कर रे चाल्यो, घर सूं बाहिर एहा।
माटी सूं बीरा रलै मिल रे जैली, कुंकुम वरणी देहा
तेरी संख्या तो बीरा पवण ढुलेलो, घण बरसैंला मेहा।
ऊपर हाली भइया हल रे खड़ेला, ढोर चरेला एहा।
गुरु परसादे भइया शिवदास बोले, मीठा दीन सनेहा।