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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-116

आतम गंग में न्हावो भाई, जा सूं सर्व पाप कट जाई

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आतम गंग में न्हावो भाई, जा सूं सर्व पाप कट जाई

भूल्या जीव भटकत है बाहर, भटक भटक मर जाई।

अड़सठ तीर्थ है तन मांही, गुरु बिन लख्या न जाई

गंगा जमुना चलै सरस्वती, त्रिवेणी इकठाई।

तन में तीर्थ न्हाय जुगत से, सतगुरु शरणै जाई

कार जप दान गिणीजै, मोक्ष मुक्ति फल पाई।

जो कोई चावै मुक्ति अपनी, तो न्हावो तन मांही

संचित आगामि करम मिटै सब,बहुरि जन्मनहीं आही।

इस विध न्हाय लहो तन तीर्थ, पाप मिटै छिन माहीं

कर सतसंग न्हाय नित हित सें, कहै संत समझाई।

कूंभाराम त्रिवेणी न्हाई, सतगुरु विधि बताई

अनंत जन्म का पाप धोय के, जीवन मुक्ति पाई।