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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-117

तुम बिन मनवो क्यों रहे, म्हारो पूरबलो संजोह

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सवैया

अजूं काया मां कोंप अजूं रीस मनि आवै।

अजूं पांच वसि नहीं अजू मन दशूं दिशा धावै।

अजूं भूख तीस धणी अजूं परतायस ईणां।

अजूं वाद अहंकार अजूं माया मन लींणों।।

एक जीव वेरी अता कुसंग साथ घट सू चलै।

कली काल किल्हो कहे किसोन किसीं पर म्हां मिले।

तुम बिन मनवो क्यों रहे, म्हारो पूरबलो संजोह

ऊधो माधो यूं कहे, कांय दिखालो छेह । टेर ।

मंगसिर श्रीरंग मेल्हिया, सब सहियां रो साथ

द्वारामती वासो कियो, गोविंद गोपियां हाथ।

पोस मास पेख्यो नहीं, मुखो न भावै अन्न

पान फूल राधा तज्या, माधवजी सूं मन।

माह लासे मन मांहिलो, चित मां व्याकुल थाय

सुपनै जागै राधेका, पोढया जादमराय।

फागण मास सुहावणो, बाजै चंग मृदंग

खेलै सभी गुवालिया, संग नहीं गोविंद।

चैत मासि चित चालियो, मेल्ह गयो निरधार

ज्यों जल बिछुड़ा माछला, कदि मेलो करतार।

वैसाख बजे वाह वाहला, नी हालै परदेस

आंसू भीजै कांचवो, विरहणि बालै वेस।

जेठ मास धरती तपे, हरि नुं तपति ज थाय

चंदण घसूं प्रीति सूं, चरचूं जादमराय।

आसाढ़े घण ऊनम्यो, गहरा गरजै मेह

पपीहो पीव पीव करै, दूधे वूठा मेह।

सावण मास सुहावणो, बरसै घोर अंधार

चहुं दिस चमकै दामणी, मेह नैखंड धार।

भादूवो भलां गरजियो, नदी बहै असराल

राधा भीजै एकली, घरे नहीं गोपाल।

आसू पाणी निरमलो, स्वाति उपजै हीर

आवो प्रीतम पीजिये, सीतल होय सरीर।

काती कंत पधारिया, सीधा वंछत काज

घर आंगण दीवो बालियो, हूवा आणंद आज।