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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-118

श्याम सिधारे चरित कियो, पंदरासै अर तिराणियो

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श्याम सिधारे चरित कियो, पंदरासै अर तिराणियो

गण गंधर्व मुनियर साथै चाल्या, परगट खेल पसारियो

परगट खेल म्हारे श्याम पसारयो, साथ चाल्या मोमिणा

क्यूं रहूँ तेरे बिना दर्शन, गोल सूना देव तुम बिना

साथरी गुरू की बणी संभरथल, जहां हरि खेल पसारियो

तिराणवैं की साध पूगी, देकरि सीख सिधावियो (१)

क्या गुण वरणूं देव तेरा, ज्ञाने हिंदू तुरक चिताविया

ऊजड़ देही बसता किया, कथ कथ ज्ञान सुणाविया

कथ्यो ज्ञान म्हारे ब्रह्म ज्ञानी, अबूझ कोई नहीं जीतिया

काजी कतेबां वेद ब्रह्मा, जुगत जोगी चेतिया

ज्ञान खड़गां जीत वसुधा, उर में राखी मेर हो

जहां देखू तहां तूं ही, क्या गुण वरणूं देव तेर हो (२)

देव तुम चाल्या संसार मेल्या, कहीं कहीं हेले जाणिया

छूटी गुरु पीरी करणी तजी, मुख्या कुभाषा ठाणिया

ठाणी कुभाषा दुनी भिलिया, थूलां सूं संग जोड़िया

देव थे कही सब बात छूटी, क्योंकर मिलसी किरोड़ियां

बाद अर अहंकार बधियो, नाहीं दीसै साल्हिया

जप तप क्रिया भगति छूटी, देव सब तुम संग चालिया(३)

थे जमाति देव रहम करो, जोती न खींचो आपणी

नफर बिगड़े स्वामी लाजै, बात घणी देव तुम तणी

बात घणी देव तुम तणी नैं, मुद्रि तुम सूं पाइये

जीवत मरिये अजर जरिये, रतन काया पहिरिये

सैतान जौलो परै परहर, राह तेरो है खरो

कर जोड़ि 'रामचन्द्र' करै विणाती, थेई जमाति देव रहम करो (४)