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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-119

सतगुरु आयो मोमणो, महर करेजी सुर नर वीनेउं साच

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सतगुरु आयो मोमणो, महर करेजी सुर नर वीनेउं साच

सतजुग कोल संभालिया, बांरा पालण वाच

वाचा तो पालण विष्णु आयो, सहज सतपंथ चालियो

गुरु ज्ञान रूपी धरम बहु विध, मुक्ति माघ दिखावियो

मानो हकीकत वरत अनहद, करो गुरु फरमाइयो

कली काले कल जुगे, महर कर गुरु आवियो(१)

सुगुरु कुगुरु बोह आंतरो जी, सांभलि प्राणी भेव

अनन्त गुणे गुरु परखि लेहो, दोष विवरजत देव

देव दोष अठारै वरज्या, जास कलंक न लागही

गुरु ज्ञान केवल वाच अबचल, जोति जुग जुग जागही

अति पात संभाल रे जीव, जांह संग दूतर तरो

अवर गुरु की न करो सेवा, सुगुरु कुगुरु बोह आंतरो(२)

अवसर जहां न चेतियो जी, भले न लाभे बेर

थोड़े रे जीवण कारणे, मनो न कीजे मेर

न कर मेरा नहीं तेरा, कलपि भार न लीजिये

छाडि मनमुख होय गुरुमुख, जो गुरु कह सो कीजिये

काम क्रोधा और कुलोभ परहर, धाय मन सूधो करे

जुग चौथे विष्णु प्रगट, चेत जीव इण अवसरे (३)

तेतीसां सूं मेल करीजो, सुरां मिलावण कांज

जिण खंडि जंबर न संचरै जी, ;षियां निश्चल राज

जहां ;षियां राज निश्चल, सदा कोड़ि सुहावणां

हूर कामणि करैं केलि, स्तन गढि रलि आवणां

दुःख दारिद्र पिसण नाहीं, जम न कौ पहुंचे कले

सोई पंथ संभाल रे जीव, चाल तेतीसां मिले (४)