साखी-111 राग खंभावची सोरठा
आतम तूं आधार, सर्व तुम्हीं सिरजिया
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आतम तूं आधार, सर्व तुम्हीं सिरजिया
दियो चुगो दातार, दाता तूं ही देवजी ।
थलि थीरू मंड है, वत्त तेल बाती
ब्रह्म व्रीकम त्रील्लोक है, दीपक तूं ही देवजी।
कोई कलंक बीना है, मोत बिना मंडल रहै
पापो पुरतियां हे, दान तुम्हारो देवजी ।
तारग तूं ही तांहै, जांह जाण्यो जीवां धणी
सुख सारो सुरंगाहै, दीप दया कर देवजी।
परहर जांह जीवां है, अज्ञानी अवगुण करै
दोरै दीजै तां है, दया न करही देवजी।
श्याम तुम्हारी छांव, ओट लई ते ऊबरया
पापां पालण नांव, दान तुम्हारो देवजी।
घणहर घींड़ बधै, अमी फुंहारे औसरयो
वूठो भाव भरै, दुनियां ऊपर देवजी ।
आयो आप मतै, जंगल थला जीवां धणी
नफरां निरत करै, दालद भंजण देवजी।
जा दिन जुग दातार, पधारयो पोहमी मंडल
नैणे निज दीदार, धन्य जां दीठो देवजी।
रहिया रोगीला है, बोहली विथा व्यापिया
वे दिन विसरियां, दारू मिलिया देवजी ।
थघ बिन थरहरता, बेड़ी बहुजल डूबंता
जल जोखे पडिया, कर गहि काढया देवजी।
पोहमी पार करे है, पंथ बीजै पठानही
थल सिर मांडयो है, दाव रहियो देवजी।
पढिया नही पुराण, सुर पूछ सीख्या नहीं
अमरापुर अहनाण, तैं दाखविया देवजी।
कवि कथणी कानाह, गुण गाथा सुणियो घणी
सच पायो सबदाहं, दिलसा भीतर देवजी।
बड़ जोगंदर जेह, ओलगियो आशा करे
रक्षा रहम करैह, दोर जातां देवजी।
मन मोकलो न मेल्ह, पसरंतो पापां दीसो
लेखो सारस हेल, दरगै लेसी देवजी।
कलप्या कोड़ि किनंक, लीला ही लाभै नहीं
मोरे कड़ा रतन, दियो दया कर देवजी।
अलवी मंझखी आल, केहक दीन कूं पहुंवली
जीभड़ी मंझखी जंजाल, दाय न आवै देवजी।
आलसियो अलगांह, राजंदर राखै रूड़ा
तारग तूं ही तांह दुरम राखै देवजी।
चौरासी लख तांह, जूण भवंता जुग गयो
तो बिन तां जीवां, दुख न भागो देवजी।
बूझै नहीं अबूझ, ग्यान गुण गुरवट तणी
ते आत्मा अबूझा, दाय न आवै देवजी।
जांह बहती बार, धर्म कदै धारयो नहीं
यों जायसी जमवार, दुख देखंता देवजी।
पृथ्वी पांवडे हे, भुंय ऊपर भुंविया घणा
सुकियारथ जकै, तो दिस दीन्हा देवजी।
कीया कर्म करूर, भोगवता भारी हुवा
मन मां हराम झुरै, दोष न दीजै देवजी।
जप बिन जे जमवार, तप बाझो तोट पड़ै
गहने नहीं गिंवार, ते दुख सहसी देवजी ।
तारक तिहुं लोकांह, लख चौरासी सारवे
हूं बलिहारी तांह, जां सनमुख दीठो देवजी।
पंडत पढ पढियाह, ज्ञानी की निंदा करै
वील्ह कहै वह जाह, गति नहीं दर देवजी।