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साखी-110 राग धानाश्री
दोय तरवर इह बाग मां, एक खारो एक मीठो
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दोय तरवर इह बाग मां, एक खारो एक मीठो
नुगरां नजर न आवही, सुगरां सन्मुख दीठो ।
एकै अमृत च्यार फल, दूजै विष फल च्यार
जो बाह्यो ते भोगवै, सुरता लेह विचार ।
अमृत पी अमृत हुवा, विष पी मरे मर जाय
अै फल सतगुरु दाखवै, बिरलां कूं बूझाय ।
क्रोध मांण माया के लोभ, अै च्यारों विषफल जोय
यांही अवगुण ऊपजै, जीवनै दोरै होय।
दान शील तप भावना, अै अमृत फल च्यार
वील्ह कहै गुण ऊपजै, जीवड़ा पहुंचै पार ।