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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-109

जन्म हारिवे दीन विगुता । टेर ।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

जन्म हारिवे दीन विगुता । टेर ।

करि किरपेण कहिये बिश्नोई, धर्म नेम ताबूत न होई

धर्म जुहै नै चालै जूता ।

जीव कारण जमै न आवै, आप भूला और भुलावै

गुरु का ज्ञान न जागे सूता ।

घुरहर करै धरणी रूखालै,के टक गुरु को कोल न पालै

दीसन्ता नर लखणै कूता।

आपण खारा करै खुंवारी, कहै बात न लहै वारी

माया मेल्ह गर्व मां सूता ।

जोसंतानै सदा धटि जुकै ,काग कलह कदहुं नहिं चूकै

रूदि करे खरभ ज्यों रूता।

कूड़ न डरै कड़कता बोले,भव बिण भारअथर्वण तोलै

वैद भेद बिना भड़के ज्यूं भूता ।

गुरु आखर पारख ना जाणै, सिर आयो सैतान बखाणै

धूते धूत मिल्या ठग धूता ।

आप अपरच गीत ना परचावै, ठालै ऊपर रीतो नावै

अचगल बोल कहे विपरीता ।

हुंकारया आंटा भाजे, चोरी जारी करत न लाजै

शर्म नहीं कोई माई न पूता ।

जप तप शील सभाय पह पूरा, दान दया सत संजम सूरा

वील्हकहे मनइन्द्रिय जीता,जन्म जीत जिण पारपहुंता ।