साखी-108 कथा गोपीचन्द की
मेल्ह बाजोट खवास बुलाया, गरम गंगोदिक मंगवाया
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मेल्ह बाजोट खवास बुलाया, गरम गंगोदिक मंगवाया
सेषत पाक अंग लगावे, कंचन वरणी काया ।
चोवा चन्दण अंग पर मलै, जोवै सति माता
कां रह्यो जीवन कां रही काया, है ये लेख विधाता ।
गोपीचन्द ज्यों नाहण संजोयो, रोई मेणावती माई
बादल नाहीं ना कोई विरषा, बूंद कहां तै आई ।
ऊँचो देखे गोपीचन्द राजा, रोवे मेणावती माई
कांय माता म्हारी अन्न धन उणी, कांय थारै अणराई ।
ना गोपीचन्द अन्न धन उणी, नां म्हारे अणराई
ऐसी देह थारे पिताजी री हुंती, बल जल हुई छांई ।
आही डंबर आही हांणी, कुं कुं वरणी (थी) देहा
ऐसी देह थारे पिताजी री हुवती, गल बल हुई खेहा ।
कुण गुरु करि थरपूं री माता, करूं कुंणा की सेवा
सोई दिस दाता होय मेरी, अमर हुवै मेरी देहा ।
पूर्व पछिम देस परहरो, उतर दिखण न जाई
अमर हुवै गोपीचन्द राजा, भणै मेणावती माई ।
उतर देश बंगला भणीजे, पछिम भणीजे रोगी
बारह बरस मोये राज करणदे, पीछे होउंगा जोगी ।
कहां पिता तुम्हारो गोपीचन्द, कहां तेरा बहण अरु भाई
वे ही ज्यों तुम जावोगे, देह चर लेलो काई ।
जाहुं रमियो जाहुं खेल्यो, जामण भोम सवाई
और सब कुछ तजस्यों माता, धोलागढ़ तज्यो न जाई ।
किता गया धोलागर राजा, कितना हस्ती घोड़ा
माता मैणावती इण परि बोलै, कलि मां जीवण थोड़ा ।
चकवे मण्डली गया सब देखो, सुरपति नरपति सोई
आसा तिसना मार लिया सब, रहण न पावे कोई ।
गोपीचन्द संजम लियो, सीर पड़यो गढ मांही
राज तज्यो जोगूंटो लियो, फिकर किसी की नांही ।
राय आंगण थारी कुवंरी झुरवै, महल अन्तेवर राणी
मन्दिर बैठी माता झुरवै, नैणे आवे छै पाणी ।
राज तज्यो जोगुंटो लियो, बनखंडि कीया डेरा
हाथ पतर भिछिया ने चाल्यो, मन ते छाडी मेरा ।
कहे गोरखनाथ सुण गोपीचन्द,भिछया कहां से ल्याओ
खीर खांड सूं पतर छलायो, जोगूंटो सझणनै आयो ।
हुवो निरालंब पहरो धोती, अंग भभूति लगावो
पहले भिक्षा घरां से ल्यावो, पाछै शहर फिरि आवो ।
गोरख वचन सुण गोपीचन्द, अंग भभूति लगाई
सज सिणगार अन्तेवर आई, थारे कासूं मन भाई ।
किण जोगी जोगूंटो दियो, कुण थां सीख चड़ायो
किण जोगी जोगूंटो दियो, कुण थां सीख चड़ायो
किण जोगी थारो मन हर लीयो, किण राजिंद भ्रमायो ।
जालंधर यो जोगूंटो दीयो, गोरख सीख चड़ायो
मोह चकर में हूं भरम्यो थो, सांसो शोक मिटायो ।
माया मोह मेर हम छाडी, थूक्या मने न भावै
तूं जाणे राजा ललचावूं, बोहड़ि धोलागढ़ आवै ।
जोगी होय करि राजा हुवां, हंसे दुनियां सवाई
मन राजा उनमन धीर आणो, सुन्दरि सुमति सुहाई ।
थे राजा जोगूंटो लियो, आंगण मढी चिणावूं
चोवा चंदण अंग परमल, आसण बाग लगाऊं ।
खीर खांड सूं पतर पुरावो, ऊपर चंवर ढुलावूं ।
बाग बगीचा इम घर हुंता, खैण धोलागिर हुंती
सोना रूपा घर ही घड़ता, आण जंबू मां फिरती ।
खीर खांड जीमता राजा, अब क्यों भिक्षा भावे
एकघर छोडया दोय घर मांगा,भुगति भली परि भावे ।
खाय मीठा और चरचरा, जिभ्यां कूं रस आवे
आहार करां मन कूं वस सुन्दरि, जीभिया ना थिर होवे ।
पिलंग पथरणा पोढता राजा, अब क्यों निंदरा आवै
सिला सिंघासण ईंट ओसीस, सुख सूं रैण बिहावै ।
मां की सीख हुवो बैरागी, मुंघ पदी मुरझाई
कहे मैणावती सुण राजिन्दर, दर्शन दोजो आई ।
तिण ज्यों तोड़ चल्यो राजिन्दर, परजा दुनि बोलावै
डावी दिसा का सूणज बोल्या,बोहड़ि धोलागढ़ नहीं आवै ।
गोपीचन्दजी रामत रमन्तो, पर मैं नगर गढि आयो
देख तमासो सूल सहर को, नायक नाद वजायो ।
होय अवधून जोगेन्दर बैठो, काया भभूति चड़ाई
दरसण परसण दुनियां आवै, सुण सुण लोग लुगाई।
निगह निगह करि नारी पूछै, कवण दिशा ते आयो
कहि नै उतपति थारी बाला, किण थांनै शबद सुणायो।
के दध आखर माता कहियो, के कहियो कोई नारी
जिण कारण थे जोगी हुवा, सोइ विध कहो तुम्हारी
ना दध आखर माता कहियो, ना कहियो कोई नारी
माता मैणावती सुपह बतायो, अमर कियो संसारी।
मरियो मरियो असड़ी माता, जिण ओ कं वर विसारयो
दूजी दुनियां दरसण आवै, क्यों नारी नेह निवारयो।
रहो रहो म्हारी माई बहणां, म्हारी मा कूं दोष न देणा
माता मैणावती घणा दिन जीवो, मुख बोलो इम्रत वैणा।
सुरष षात सुणी शहर मां, राजमहले राणी
सोच कियो सोहे लाली सुन्दरि, नैणे आवै पाणी।
माता मैणावती माय भणीजै, तूं गोपीचन्द भाई
मर मर जाऊं थारी सूरतनै, बहण मिलणनै आई ।
गोपीचन्द हित कर मिलियो, भाई भुजा पसारी
धीरज करो गहो मन गाढो, गोपीचन्द भिखियारी।
गोपीचन्द बोल जो बोल्या, गह भरि नैण जो आया
एकरसौं घर चल मेरा बीरा, बहनड़ शब्द सुणाया।
बात कहूं सो सति करि मानी, बहनड़ बात विचारी
तुम साहेब गढपति राज, हम जोगी भेष धारी।
ऊंचै मंदिर चढै और जोवै, निरख चहूँ दिस न्हालो
होय दिलगीर नै सांसो घात्यो, पंथी पंथ संभालो ।
रिण मां रहता बन मां बसता, देश दिसावर फिरता
कह भरथरी सुणी गोपीचन्द, राज ज किस गढ करता ।
हींवर हस्ती गौड़ करंता, सिघ वराहां लड़ता
घड़ नाए म्हे बस तीरंता (?), समंदा री लहरां लीता ।
हर दिन मां हर कोड पड़न्ता, घुरत पखावज बाजा
खांडी खपरो ले निसरियो, धोलागिर को राजा ।
बो सुख तजिया राजा है जोगी, चुकी जामण मारियो
गोरख वचने गुरु परसादे, गावै जोगी दरियो ।