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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-107 भरथरी की

सुणो राजा राणी कहे, उठ (करि) महल पधारो

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श्लोक

कुचील कंथा कुचील पंथा, उन्हा ठंडा भोजनं

वने वाघुं गुफा सरफुं, पवण सील डिगमिगुं

बरसि बरसि निर्दयी मेहा, भरथरी भए निहचलं ।

सुणो राजा राणी कहे, उठ (करि) महल पधारो

जिण जोगी भ्रमाइया, जांका संग निवारो ।

फूलां ज्यूं हम दिल मिली, पानां ज्यूं चाई

कुष्टि होवेंगे राजा भरथरी, अब क्यों कहो माई ।

फूलां ज्यूं हम दिल मिलो, पानां ज्यूं चाई

अणसमझे की स्त्री, समझे की माई ।

हम तो कान चिराइया, रणसींगी बजाई

जोगी हुवो राजा भरथरी, तुम घर जावो री माई ।

जन्मत जोगी ना हुवा, भिक्षा कूं फिरिया

परण पाप क्यों कियो, बीच डूबी नवरिया ।

जलणी जलमंता रस दियो, विष दे क्यूं ना मारी

जोगी हुवो राजा भरथरी, कुण गति हमारी

भवंगा छोडी कांचली, भींते छोडया लेव

राज तज्यो राजा भरथरी, भावै सोई लेव ।

हाथोड़ा छोडया राजा हींडता, घोड़ा घुड़शाले

राणी तो मेल्ही रंगमहल में, बाला पटशाले ।

राग-जताश्री

सोदागर सोदे मिल्या, जाणै लोक बटाउ रे

दीन्हा वनफल देखि के, हम भये बाट बटाउ रे ।

खथा करां उकटाव की, नव भांती का डोरा रे

चोवा चंदण चरचरां, करि पूजूंली देवा रे ।

खथा हमारे नांव की, साहेब सूं सूरत लाऊं रे

हाथ पतर करि बागली, घर घर अलख जगाऊं रे।

पति राखो पणमैसरी, तमै देहवो व्योहारा रे

जोगी हुवो राजा भरथरी, धिक धिक जन्म हमारा रे ।

नगर नायक बिन भणहणया, झुरवै बहण'र भाई रे

भागवन्ती अन्न ना जीमै, अलख पुरुष ल्यौ लाई रे ।

राज तज्यो वनवासियो, मन ते छोडी मेरा रे

शब्द सुणे सुणि श्रवणे, राजा विक्रमाजीत आया रे ।

जलणी नीर निवाण ज्यों, भल भल मोती छूटा रे

वीर करै छै वीनती, राजा चलो अपूठा रे ।

इण परि बोले राजा भरथरी, हरि का नाम पियारा रे

नहिं काहू का बांधवा, ना कोई बीर हमारा रे ।

जलणी जलम न बीसरै, अछधारा चुंघाई रे

भीड़ पड़ै जदि बाहुड़ै, जामण जाया भाई रे ।

छत्तीसूं भोजन जीमता, अति होता सुखवासी रे

टुकड़ा सांझ संवार का, कहि न क्योंकरि भासी रे ।

दुख सुख जद का सिरजिया, सिर धर लिखिया दावा रे

उन्हा ठंडा भुगतिस्यां, थे साथी घर जावा रे ।

बीर बोल उं बाहड़या, करि करि पछला मेला रे

प्रेम का सील शरीर मां, अति जीव होय दुहेला रे ।

वीर बिछुनां नरपति, रण मां रैण बिहाणी रे

इन्द घटा करि आवियो, चमकत बीज सुहाई रे ।

राग मल्हार

कोस आंतरै आंथव्यो भाण

धन्य धन्य मेह कर प्रवांण

घरहरे घरहरे बरसै छै मेहा

भीजै छै भरथरी भूप री देहा

जीव उडिया छै तरवरे पान

भरथरी भणहणो वने विश्राम

घणहर गाजैजी घटा घणघोर

बाग बिना झुरै एकलो मोर ।

पवण पाणी घट घेरयो छै जीव

तरवर ताकियो घरहरै सींह

देय र गुफा सरप रो रूप

संकियो साध न दीयो छै दुःख

पवण सूं पंछियां सिला डिगाय

देह ताहि शरण दीसै नहीं काय ।

राग जताश्री

साधो वाकरि ऊधरया, गुरु म्हारे ज्ञान सुणायो रे

निहचै ते कारज सरया, आवागवण न आयो रे ।

साच शब्द कालू कहे, यो छै जोग विचारी रे

जोगी हुवो राजा भरथरी, हरि भज जलम सुधारी रे।

जोग लियो राजा भरथरी, तुम घरि जावो री माई

जोग लियो भोलेनाथ जी ।