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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-106 बारहमासो

मथुरा कान्हड़ अवतरयो, आठूं मंगलवार

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मथुरा कान्हड़ अवतरयो, आठूं मंगलवार

घर घर रली बधावणां, घर घर मंगलवार

मेरे उमाहो चतुरभुज कान्हरो, पुरि वसियै रा मंगलेश

कुंवर कन्हेइयो पुरि बसैं । टेर ।

घर घर तोरण बंधिया, घर घर बंदरवाल

साधु सुधारण आवियो, दैतां रो खैंकाल ।

जे हूँ जाणूं रुखमणी, कान्ह दिसावर जाय

काठ चन्दण रे पींजरै, मेल्हूं आंय छिपाय

हाथ झड़ोलो सिर मुकुट, उंतावलो फिराय

गोपियां मने बधावणां, रही मन अणराय ।

नारद पूछै जोयसी, दोय दिन कितरा मास

काल्हे श्रीरंग बीछड़या, मो मन बरस पचास ।

नारद जोतिष बांचियो, सांसे पड़यो शरीर

आंसू नाखे मोर ज्यूं, नैणे निझर नीर ।

ऊंचै मगरै धन चरै, सरवरि बोल्या हंस

गोपी करै बधावणा, जाणै कान्हव जायो वंस ।

एकज काली कांबली, एक अंधारी रात

कान्ह गुमायो गोपियां, बीजल खिंवै झबाक ।

उमाहो बण कोयलां, उमाहो वणराय

उमाहो कदे न चूकही, श्रीरंग तणा पसाय ।

एक गोवल रे डांडले, लख आवै लख जाय

एक न आयो कान्हजी, रह्यो दिसावर छाय ।

सावण मास सुहावणो, जे घर धीणो होय

धीणो वाज सुहावणो, जे घर कान्हड़ होय।

सावण असलां सालणो, बीजल बूंद सुचाल

राही दिये सनेसड़ा, घर आवो गोपाल ।

घन गरजै दावण खिंवै, बोलै चात्रग मोर

गोपी गिरधर कद मिले, नागर नंदकिशोर

घन गरजै दावण खिंवै, चात्रग मने उदास

सर छलिया सरिता बहे, मनां न पूरी आस ।

भादूड़ै सर छीलर छल्या, चौचक बीज खिंवाय

गोपी झूरावो करै, विरह दहे मन मांय ।

चम्पो मरवो केवड़ो, भंवर रह्या रंग लाय

गोपी सारै वीनती, श्रीरंगजी घर आय ।

आसोजे आशा घणी, बेलै मोरण गाल

नैणे माघ न मावही, नीर झुरै असराल ।

स्वाति मोती नीपजै, बाजै बाव सुवाव

संतां कारण श्यामजी, श्रीरंग करो सहाब ।

कातिक राही रलबलै, चढै चौगणा चाव

बांदी थारी नारदा, लै श्रीरंग घर आव ।

कातिक मास काम घणो, पंथियां गवण न होय

कान्हजी आय जो कहे, तिणजी बडो न कोय ।

चात्रग मन जलहर बसै, ज्यों चकवी मन भाण

राही मन श्रीरंग बसै, सुन्दर बरण सुजाण ।

मंगसर मनवो, कंबल रह्या विगसंत

नलणी सायर छंडिया, बाहणि देव अनन्त ।

मंगसर मारग मोकला, पथी चालै वाट

क्यों करि आऊं नारदा, पंडवण रूधा घाट ।

पोह पहाउ ऊगवै, निलखणिया कुण धीर

गोवल गयो न बाहड़ै, सोहदल केरो वीर ।

खड़ी उडीकूं पंथसिरि, नैणे मूक्यो नीर

विरह वियापे हे सखी, छीजै सकल शरीर ।

माह मासे पाला पड़े, अजब तुरी चराय

इण रुति गवण न कीजिये, भुंवंग पंयाले जाय ।

पंयालां री पदमणी, मांडै मने उछाह

राग बसंते बजावियो, विरह जाग्यो दुःख दाह ।

फागण फाग हीलोहलो, वैण विलम्बी खेह

इण रुति गवण न कीजिये, सणहणै सुखै देह ।

देह सूख पींजर हुई, लागत तनै मंत

धन धन कामणि विरहणी, जां वर हरिजी कंत ।

चेतै चाचर मोरिया, मोर रह्या झिंगारि

शंख न सुणिये बाजतो, मथुरा नगर मंझारि ।

मथुरा नगर सुहावणो, निर्मल जमना नीर

श्रीरंग आवत जो कहे, शीतल हुवै शरीर ।

वैसाखे बण मोरिया, मोरी सा बणराय

दोय न मोरया रूखड़ा, एक पाडल एक जाय ।

वैसाखे विश्वम्भर न आवियो, करि अबला सूं नेह

गोपी सारै वीनती, कांय दिखालै छेह ।

जेठ तपे लू खलहलै, षुरहा सुर तपाय

श्रीरंग आवत जो कहे, जे नर लाख लहाय ।

लाख देऊं पाये पड़ूं, करां इधक ही सेव

मन रा मनोहर जो हुवै, घरे पधारै देव ।

जेठ तपै लू खलहलै, नदियां नीझर नीर

माहुवो मनां न वीसरै, सोहदल थांरो वीर ।

आसाढै आशा घणी, वणी झिगारे मोर

कील्ह कर हरि आवियो, सुण जलहर की घोर ।

असरां मां वासो हुवो, बहुड़ि सरसी दास

कील्ह कह हरि आवियो, पूगा बारहमास ।

शंख पंचायण बाजियो, राग रंग उदमाद

इन्द बधावो आवियो, वेद सरस धुन नाद ।

आंगण बावूं एलची, बाखल नागरबेल

कान्हजी घरै पधारिया, म्हारा हिवड़ा कूंपल मेल।