साखी-105
सतजुग सतपंथ प्रगटयो, साहेब करै सहाय
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सतजुग सतपंथ प्रगटयो, साहेब करै सहाय
आदू देवां दाणवां, यूं ही चाली जाय ।
ओ बाड़ो प्रहलाद को, कलि यों कही न जाय
नरसिंह नर देवता, अणचींत्यो ही थाय ।
हिरणाकुश हरि निरदल्यो, मारयो पोल अड़ाय
उजर विष्णु बिन कुण करै, देव न आवै दाय ।
पांच सात नव बारहां, मेलो करै खुदाय ।
मोमण उछरंग फिरै, मेलो दियो खुदाय ।
साहबदास कल्याणमल, जदि डंडिया सेखा
करनो और दौलत खड़या, विश्नोई चंपीया ।
वित जांभाणो जीवां, तदो काही लिया
रामसिंह कहे थारो वित, घणो म्हांनै दे दिया ।
तोनै अतरो न देवूं, सूई आवै अगराह
जे तूं पोतो कल्याण रो, म्हांपण नां रूसाह ।
आ विध बैठा बोलिया, दोनों गया बिताय
अकल नारी कूं देस्यूं, हूवै खड़ाणा आय ।
हरीपाल और बाली खड़या, धरमण और फूलां
करमाणी अरु पुनूं खड़या, वीसल अरु सैंसा ।
खड़ीयो बालक आसियो, स्याणे रे लागो घाव
हेल पड़ी पाछा गया, टाकर ले टलिया ।
कै दीने तो झथा पड़या, होय कर दांत भगाह
कालो चडयो कुराज नै, सेखाणीये पगाह ।
जसवंत मेघे नै कहै, टीको मोहि दिराय
नाथ रुपइयो घातस्यूं, कही काके जाय ।
जसवंत मेघो अलोच कै, गया जरासिंह राय
जे तूं टीको म्हां देवै, तो दां नाथ मंडाय ।
कलिका ठाकुर लोभीया, घात्या हाथ संवाय
कागल ऊपर लिख लिया, धूंवो नाथ रलाय ।
वाड़ज कीजै जतन नै, पालण नै हरियाव
वाड़ चरै जो खेत नै, करणो कासूं जाय ।
हरियाव नै राजवी, खेत दिया मुकलाय
करसण हरियाव चर गया, हाथ गया धुड़ि मांहि ।
आश पिया सो राजवी, लीयो कोट चिणाय
दमड़ा लो विसनोइयां, ज्योलां सूत फिराय ।
सलुड़ आयो तप्यो, तिण विण तोपरिया
अपणी जंभ देव री, गति उठी अगाह ।
पहले पोत पीथु खड़यो, उजाल्यो गुरु राह
तकर ले करि बाकरा, तंगोटि पठाह ।
रुडो अरु दामां खड़ी, बाकरा पण छुटाह
जाणके सत ना हारी, भिलीया जाय कुता ।
टुकड़ो मिल्यो हराम को, तिंह बिन रह्यो न जाय
गति जांभाणी भोलवी, ले करि दाम दीया ।
दमड़ा ले पाछा वल्या, बीकानेर गया
जेब ऊपर नांवही, घर बैठा बतलाय ।
कुंवर अरु धानड़ी कै, बेड़ी बाही पाय
इहिं औसर वीरम खड़यो, धारा तीर्थ न्हाय ।
धरमो वीरम जसरथ मारिया, डेल्हाणो हेराया
बीकानेर नै उपड़या, बीकानेर आया ।
पंचायण राणो कहै, बीड़ो दियो अलाह
ताजौ ताजौ होय रह्यो, किरिया सरस कमाय ।
हरजी ने हीरां कहै, तो गति मोहि मिलाय
चारयों हुवा एकमना, गाडी लिया चड़ाय ।
धुना धोरी जोतिया, रास पिराणी सोहे
थुथकारे अर थापले, कोट गया गणकाय ।
गाडे हुंता उतरया, तितउ जु सझिया
तीवक कर चड़िया, कर हउतो उतरया ।
बैठा कंध नुवाय, सांकर
हमीरो धानड़ौ, ऊभा खड़ग समाह ।
तीन हुक्म फुरमाण ले, शिर तोड़या तड़काय
मोमण सुरगे नावड़या, छांटो पोल लगाय ।
उबस खा कर बावड़या, मिल्या जमाते आय
रासीसर थी उपड़या, पड़या सतगुरु जाय।
ओ जांभाणो बाकरो, गल बाढया घर राय
इंडो पड़यो मुकाम को, ज्यों जाणै दुहपिया ।
उजर विसन बिन कुण करै, देवै नै आवै दाय
कायर काल्हां ठाकुरां, कहै ज मेल्हा डकराय ।
ज्यों अै मांगै त्यों दीवै, सकै न शीश ऊंचाय
शीश चमक्यो सालिया, मन अपनी अणराय ।
ज्यो अै मांग्यो त्यों दिवे, तो अपणो गुरु लजाय
आसो कान्हड़ वरसिंघो, गोयंद गोपाल ।
रामट रूड़ो राजड़ो कूरासो मदेदा
मेलो कीयो मोमणां, थोड़ा पण रूड़ाह ।
मतो कियो अजमेर को, पूले चाल्यो पतिशाह
आगै डेरा सूर का, ताह विच निसरिया ।
श्रीरंग तो जातां लख्या, मांही सलिया बुलाय
डेरो कीयो मोमणे, कै दिन आलगिया ।
सूरे डेरा उखरया, चाल्या दिखण देश
तीन मंजल साथे गया, दया न दीठी कोय ।
मोमण पूठा बावड़धा, डावै पग की उडाय
उदांणी झूंझलाविया, कीया बोल भला ।
जाय मिल्याई तमाम नै, दोलैकी दिल साह्य
मुजरो कर पतशाह को, लीवी छाप लिखाय ।
ऊपर मोहर मांड कै, गाढ़ा धीर किया
मजले मजले चाल के, कुशले घर आया ।
मोहर मेटे पतिशाह की, कुण पूत जायो माय
हाडी अरु साया, फिरै लालहु लाग ।
चारण ब्राह्मण जोगियां, सह मेटया तागा
परियो आया पुजता, ताही सीर भागा ।
कोहर आयरु ऊतरया, जंगल वहां जायगा
कुबधी मन आलोचिया, मारण मता हुवा ।
आश हरखू लाडली, गूंझ किया घर माहिं
विष्णु भगत मोटो मतो, नानग भलो न ठाय ।
संझ गुरु सूं आयो धनु, तिण री भली सराह
पारवे हुंतो आवियो, धरमु धरम धियाय ।
उदासर सूं आवियो, कलियो दिल परचाय
भाखरे भ्रम चुकाइयो, धन्य कोचर री माय ।
राऊ देवजीनै कहै, थां गति मोहि मिलाय
प्रहलाद रूपी खड़या, तांहरी बडी सराह ।
पुरां पुरां होय रही, जांरी भली सलाह
मेलो कीयो मोमणों, थोड़ा पण रूड़ाह ।
आपो आगवियां पछै, कुण राणो राव
जिण दिन आयो आगवौ, तिण दिन तो पिणशाह ।
तित हाडी अहरस करै, चारों उखणियां
स्यांणो राणो पुल्हजी, मोमण तीर बंका ।
वेहरा आखर ना मिटै, अंकुर जो लिखिया
सांझ खड़ाणो जा हुवो, गिरह चड़ पुजाह ।
हाडी दीसै अदीयावणों, जाणै ब्राह्मण खातागाय
नाथगोली घण बाण सर, घणहर ओल्हरिया ।
हरखु अरु लाडू तणो, शिर तोड़या तड़काय
आसो वरसिंह ने कहै, म्हां पण वेग खड़ाय ।
सर आख्यां लाग्यां पछै, सूरापण दीखाविया
कंवर जांभाणो क्यों रुके, कोचर वरसिंग मंडिया ।
जाय अणीचड़िया, बात कहंता
बार होवै तड़भड़, लिया खड़ाय ।
जाण कबाड़ो देहरे, रिण धर मुंड पया
इडोवले संवार कै, कारीगर उठिया ।
उहांडिये भेला करे, होतासण होम्या
तिथ ग्यारस तेरोतर, मोमण खेल कीया ।
सुकल पख आदर नखत, मोमण मुक्ति गया
राकिया मारजां, बाहर करी बाह बाह ।