साखी-47
अहरण नाहिं हथोड़ा नाहिं,
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
भंवर म्रमै ऊजलो, हन्स में कालो दीठो।
पाणी मरै पियास पवन तप करै पयठो।
अन्न छुघा दूबलो, जड़ड हौं कप्पड़ कप्पै।
तिरिया रोवत देख थान दे बालक थप्पै।
लूणा अलूंण धृत लुखों सोल तेज पावक सरस।
नसनाथ सिद्ध पूछै अलू जोग स्रगार क वीर रस।।
अहरण नाहिं हथोड़ा नाहिं,
पाणी सूं खालक राजा पिंड घड़े रे।
नाके सांस लेवो मुख बोलो,
श्रवणे सांभलो ज्यों सुरति पड़े रे।
नेण चलण रतनागर दीना,
कौण स दाता देव बड़े रे।
विष्णु विष्णु तूं जप रे जीवड़ा,
अबके आयो जन्म रूड़े रे।
ले माला हरि जाप न कीयो
जपतां री ( मुखां ) जीभ अड़े रे।
पापां रे पसायो जीवड़ा दौरे जैलो,
उत कण अफरी तेरे मार पड़े रे।
गाडरियो हुवैलो कीच में पड़ैलो,
झाटकणां री थारे झूर पड़े रे ।
करहलियो हुवैलो फिरैलो कतारे,
भार उठावे लड़े छड़े रे ।
दसां मणां री तेरे गूण पड़ेली,
ऊपर ओठी कूद चड़े रे।
हाली के घर धोरी हुवैलो,
आर सहेलो ( तीखी गड़े रे ) ।
ओडां के घर पोहणियों हुवैलो
ले ले बोरी पाल चड़े रे
सुवरियो हुवैलो शहरे फिरैलो,
ठरड़क ठरड़क तेरी नास करे रे।
कूकरियो हुवैलो गलियां फिरैलो,
आवे बटाऊ झबक लड़े रे ।
कंबलियो हुवैलो गिगन भुंवैलो,
कूरंग उतर तेरी चांच पड़े रे।
जब लग जीवड़ा तैं सुकरत न कियो,
ज्यूं ज्यूं नान्ही जूण पड़े रे ।
ऊदो भणे रे जपो निज नामी,
देव ( नहीं ) कोई जंभ धड़े रे ।