मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह221 / 157
प्रचलित साखी समूह एक

साखी-46

जीव नै । टेर।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

जे खर बन्धे ठाण, पास कजियो के काणो

कोड़रू कजियो चरै, दिन प्रति दीजे दाणो

खरतर खिदमतगार ख्याति कर खुर्रा कीजे

पाणी पणघट ले जाय नीर निर्मल सूंन्वाइजे

सू टै तो ओ खर चरै, ओकरडी जाके लिटै

वील्ह कहै विसन चरित बिन, असली कदै न पालटे।।

जीव नै । टेर।

विष्णु विसार न जाय रे प्राणी, तिंह सिर मोटो दावो । 1।

दिन दिन आव घटंती जावै, लगन लिख्यो ज्यों सावो। 2।

काला केश कलाहल आया, आयो ( छै ) बुग बधावो । 3।

पालटिये गढ़ कांय न चेत्यो, घाती रोल भनावै । 4।

ज्यों ज्यों लाज दुनी की लाजे, त्यों त्यों दाब्यो दावो । 5।

भलो हुवै सो करै भलाई, बुरियो बुरी कमावै । 6।

दिन को भूल्यो रात न चेत्यो, दूर गयो पछितावै । 7।

गुरुमुख मूर्खों चढै न पोहण, मन मुख भार उठावै । 8।

धन को गरब न कर रे मूर्खा, मत धणियांनै भावै । 9।

हुकम धणी को पान भी डूबै, सिला तिर ऊपर आवै । 10।

चावल उडै तुस रहेला, को बाइंदो बावै । 11।

षिण ही मासो षिण ही तोलो, षिण वाइंदो वावै । 12।

षिण मेघ मंडल होय बरसै, षिण चाबायो बावै । 13।

षिण ही जाय निरंतरि बरसे, षिण ही आप लखावै । 14।

षिण ही राज दियो दुर्योधन, लेता वार न लावै । 15।

सोवन नगरी लंक सरीखी, समंद सरीखी खाई । 16।

महारावण सा बेटा जिहिं के, कुंभकरण सा भाई । 17।

जिण रे पाट मंदोदर राणी, साथ न चाली साई । 18।

जर जंवराणां सकल बांध्या, फेरी आपण राई । 19।

जिण रे पवन बुहारी देतो, सूरज तपै रसोई । 20।

वासन्दर ज्यांरा कपड़ा धोवै, कोंदु दल वहाई । 21।

नवग्रह रावण पाये बंध्या, कूवै मींच ( मौत ) संजोई । 22।

तिण हुं विसनजी री खबर न पाई, जांतै वार न लाई । 23।

गुरु प्रसादे हुयो पोह वीदो, मानी विसन दुहाई । 24।

चांद भी शरणै सूर भी शरणै, शरणै मेर सवाई । 25।

धरती अरु असमान भी शरणै, पवन भी शरणै वाई । 26।

सूर आकाशे शेष पंयाले, सतगुरु कहे तो आवै । 27।

भगवीं टोपी थल सिर आयो, करियो जो फुरमावै । 28।