साखी-45
मिनखा देही है अणमोली, भजन बिना वृथा क्यूं खोवे।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
सिंवर-सिंवर हरिनाम, जिण बीस पक्ष रक्षा कीनी
गर्भवास की त्रास, एक न लागण दीन्ही
रे मतिहीण मजूर, हजूर आगे जाब न आसी
लेखो लेवण करी बार, वा तनै कूण छुड़ासी
भजन करो भगवान का, तोह भेज्यो संसारमें
रात्यो विषय विकार, उदा हार गयो जमारनै
मिनखा देही है अणमोली, भजन बिना वृथा क्यूं खोवे।
भजन करो गुरु जंभेश्वर का, आवागवण का दुखड़ा खोवे।
गर्भवास में कवल किया था, कवल पलटे हरि विमुख होवे।
बालपणे बालक संग रमियो, जवान भयो नारि बस होवे।
चालीसां में तृष्णा जागी, मोह माया में पड़ कर सोवे।
बेटा पोता और पड़पोता, हस्ती घोड़ा बग्घी होवे।
धन कर ऐश करूं दुनियां में, मेरे बराबर कोई न होवे।
गर्व गुमान करै मत प्राणी, गर्व कियो हिरणाकुश रोवे।
गर्व कियो लंकापति रावण, सीता हड़ कर लंका खोवे।
सच्चा पायक रामचन्द्र का, हनुमान बलकारी होवे।
तन में तीर्थ न्हाय त्रिवेणी, ज्ञान बिना मुक्ति नहीं होवे।
ज्ञान नहीं बन के मृगे ने, किस्तूरी बन बन में टोवे।
अड़सठ तीरथ एक सुभ्यागत, मात पिता गुरु सेवा से होवे।
दोय कर जोड़ ऊदो जन बोले, आवागवण कदे ना होवे।