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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह219 / 157
प्रचलित साखी समूह एक

साखी-44

जीव नै । टेर।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

पंनरा बीस पच्चीस कोश दश कुकर्म धावै।

पापी फिरे प्रदेश धर्म ढुकड़ो न आवै।

सुगुरू सेवन करै कुगुरू दिश कंध निवावै।

चोरी झगड़ो झूंठ, गीत जंगल का गावै

आमो बेल ऊखणै सींचें सम्बल आक सिणी।

जंगल जीव जामै मरै भगती न लाभै भाग विणो।।

जीव नै । टेर।

तारणहार थलां सिर आयो, जे कोई तिरे तो तिरियो।

जे जीवड़ा को भलपण चाहो, सेवा विष्णु की करियो।

मिनखा देह पड़ी पुराणी, भले न लाभै पुरियो।

अड़सठ तीरथ एक सुभ्यागत, घर आये आदरियो।

देवजी की आस विष्णु की संपत, कूड़ी मेर न करियो।

उंनथनाथ अनु नंवावै, भारत ही अण करियो।

रावां सूं रंक रंके राजिन्दर, हस्ती करै गाडरियो।

ऊजड़ वासा बसै उजाड़ा, शहर करै दोय घरियो।

रीता छालै छला रितावै, समंद करे छीलरियो।

पाणी ते घृत कुरी ते गरड़ो, सोझी ते बाजरियो।

कंचन पालटि करै कथीरा, खल नारेले गिरियो।

पांचां कोड़या गुरु प्रहलादो, करणी सीधो तिरियो।

हरिचंद राव तारादे राणी, सत सूं कारज सरियो।

काशी नगरी मां करण कमायो, साह घर पाणी भरियो।

पांच पांडु कुंतादे माता, अजर घणेरो जरियो।

सत के कारण छोड़ि हस्तिनापुर,जाय हिमालय गलियो।

कलियुग दोय बडा राजिन्दर, गोपीचन्द भरथरियो।

गुरु वचने जोगूंटो लीयो, चूको जामण मरियो ।

भगवीं झोली भगवीं कथा, घर घर भिक्षानैं फिरियो।

खांडी खपरी ले नीसरियो, धोल उजीणी नगरियो।

भगवीं टोपी थल सिर आयो, ओ गुरु कहै सो करियो।

तारणहार थलां सिर आयो, जे कोई तिरे तो तिरियो।