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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित सोरठ की साखी

साखी-43

मन मेरा सौदागरा मेरा जीयो, विणजत नेहड़ा कीजै

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

जाकै बावन कस्वै नींव, आण जमू में फिरती।

तज्या शहर गढ कोट, तज्या गढ गेवर हसती।

तज्या भोग विलास, तजी अन्तेवर राणी।

इतनी मेल्ही मैर, धिन उदा वो प्राणी।

जीवत मूंवा खाक हुआ, गुरू वचनां जरणा जरी

अमर हुवा संसार में, गोपीचन्द अरू भरथरी

मन मेरा सौदागरा मेरा जीयो, विणजत नेहड़ा कीजै

जिण जीव पिंड संवारियो, रसना रस विष्णु जपीजै

जपो रसना विष्णु बहुविध, जांतै लंघिये पारियो

संसार राता मदमाता, जां रतन जन्म ज्यूं हारियो

काया कफ रूधी आपो न संभलै, फंद पड़या जम नेड़ा

कह 'रायचंद' तिस नांव तिरिये, कीजै विणजत नेहड़ा (१)

मन मेरा विणजारलो मेरा जीयो, तुं देख आपा संभालवे

आप अकेला आविया, नाहिं तूं संद नालवे

नाहिं तु संद नाल प्राणी, चल्या आप अकेलवो

स्वर्गे जाय तो आप सोहेलो, आप अगति दुहेलवो

जो आया सो रह्या न कोई, सभी वस कालवै

कह 'रायचंद' संसार अनेहा, देख आपा संभालवै (२)

संसार भलाई मेरा जीयो, जो कुछ चालै साथवै

आग बलतो झूंपड़ो मेरा जीयो, सार चड़ै सोह थावै

जो कुछ चालै साथ जीव कै, रहंदा काम न आवही

ना कुछ गुन हाथ रे जीव, उरहां काम न आवही

ना कुछ गुन हाथ रे जीव, उरहां कौन बुलावही

धर्म नेम सत संजम हरि चित, इतना आवै अर्थवै

कह 'रायचंद' संसार भलाई, जो कुछ चालै साथवै (३)

जिण हरि सूं चित लाया मेरा जीयो, पाप न लैंदा भारवै

गुरु अपणा अपणाय लेसी, आप लंघावै पारवै

आप भवजल पार लंघावै, जे एक मन धियाइयो

पाप पुन दोय संग होयसी, बहुरि न इस कुड़ि आवियो

जांमै विणस विणस जांमै, एहा ओ संसारवै

कह 'रायचंद' ते हलवां जायसी, पाप न लेंदा भारवै (४)