मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह217 / 157
प्रचलित सोरठ की साखी

साखी-42

जुग मां जनम लियो मेरा जीयो, बसीयो आय बसेरो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

विद्या तो वर नागरी, मोक्ष सन्सारा तारी।

विद्या मित्र विदेश खन्ड प्रख-न्ड पियारी।

विद्या आदर दांन मान पण विद्या पावैं।

विद्या रूप करूप जहां जाय तहां समावै,

विद्या नागर बेलसी चतुरां नरां रिझांवणी

मीठी मिसरी खांडसी कील्ह कहै मन भांवणी। १०।

जुग मां जनम लियो मेरा जीयो, बसीयो आय बसेरो

कामण कोड़ करेलो मेरा जीयो, जमदल देला फेरो

जमदल फेरो आण घेरयो, पुण्य पाज बंधाइये

नाम नाली ज्ञान गोली, धरम बाण चलाइये

भरम भांगो जोति जागे, कोल सतगुरु सूं कियो

लाछ लछमी नांव तेरे, जीव जुग मां जनमियो (१)

गोवल वास बस्यो मेरा जीयो, सुक्रत करो कमाई

कुटुंब कोड करै मेरा जीयो, बाजै बिड़द बधाई

होवै बधाई मंगल गावै, हरख मन आनंद घणो

भाट ब्राह्मण विड़द बोलै, हुवो कुल मां चांदणो

स्वर्गे सुख अनंत अधिका( इधिका ), साध संगति रलि मिले

साच शील संभलि रे जीव, वास बसियो गोवले (२)

पापां प्रीत तजो मेरा जीयो, क्रिया करो कमाई

जम की भीड़ पड़ै मेरा जीयो, तां दिन विष्णु सहाई

विष्णु सहाई होय भाई, ओघट घाट लघावही

जीव काजै दान दीजै, अंत आडो आवही

आन को आराध मेटो, जीव घात कोई मति करो

दया विहुंणा जाहि दोजख, प्रीत पापां परहरो (३)

संतां री सेवा करो मेरा जीयो, भजन करो गुरु भाई

धर्म धियान धरो मेरा जीयो, जाय मिलो सुरराई

सुरराय मेलो हुवै जां दिन, हरख मन कामण करै

सिद्ध साधु कुशल पूछै, वेद ब्रह्मा ऊचरै

उपकार सार विचार रे जीव, जाण मन क्यों बीसरो

भजन भक्तां भेद लाभै, सेवा सतगुरु की करो (४)