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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित सोरठ की साखी

साखी-41

मिनखा जनम मिलै मेरा जीयो, चूकै भव चौरासी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

जिण नगरी धर्म दिढ़ाव सत सिवरण नर सूरा।

सझै सुचील सिंनान जुगती जरणा पण पूरा।।

मेल्हयो मन्य भिरांत भरम भौ लावै भानै।

जपै एक विसन भूत सेवा नहीं माने।।

औलखियो जम्भसांचौ सुगरू धन्य जीवतताकों जीयो।

वील्हा जी को दीन जीवीजै तींह नगरी वासो लियो।।

मिनखा जनम मिलै मेरा जीयो, चूकै भव चौरासी

नूंवो लेखो हुवै मेरा जीयो, करसी सो जीव पायसी

कियो पावै जिसो करसी, दोस काहू न दीजिये

सवा डोढा दूणा अनंता, ऐसो माल विसाहिये

सुमति कुमति दोय फल है, मिनख जमारो पाइये (१)

कुमति संग काम क्रोध मेरा जीवो, हठ अहंकार कुलोभी

लालच चोरी ठगाई मेरा जीवो, कुमलि कुचील कुसोभी

कुसभी मुख कुसुभ भाखै, सुभ साच न ऊचरै

दान शील तप भाव नाहिं, दया हिरदै न धरै

स्नान धियान भजन नाहिं, दोरै वासो दीजिये

मिनख जमारो अफल होवै, कुमति संग न कीजिये (२)

सुमति संग शील संतोष मेरा जीयो, सुवचन साच सुभावै

क्रिया भजन धर्म मेरा जीयो, गुण गोविंद का गावै

गुण गावै मुक्ति पावै, आन सेव न अउचरे

उपकार सार अपार अह निस, धियान हरि हिरदै धरे

मुकति माघ इण विध धियावै, दान सुपहा दीजिये

रतन जन्म संसार सागर, सुमति सुसंग कीजिये (३)

ओ औसर मिनख जनम मेरा जीयो, वारो वार न पावै

हरि जन पार लंघ्या मेरा जीयो, वोहड़ि न इण खंडि आवै

आवै न इण खंडि करै कैला, सदा कोड सुहावणा

हूर कामण करै कैला, रतन गढ रलि आवणा

विष्णु दरसण सदा परसै, सुन्य वासो बिसन को

'परमाणंद' गावै दरस पावै,ओ औसर मिनख जन्मको (४)