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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित सोरठ की साखी

साखी-40

जां दिन संत मिलै मेरा जीयो, बाजै स्वर्गे बधाई

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

सिंवर विसन सत जांण गिण्यो बासग बखांण्यो

सिवर विष्णु सत जाण, पहल पहलाद पिसाण्यों

सिंवर विसंन सत जांण प्रीत पांडवा सूं पाली।

सिंवर विसन सत जाण गज की लाज बचाली।।

धुता-रयो तारयौं करण सिंवर दधीच सुधारिया।

तारसी तोह सोंई सिंवर सब अनेक उधारिया।।

जां दिन संत मिलै मेरा जीयो, बाजै स्वर्गे बधाई

कामणि कोड करै मेरा जीयो, अपसर मनो उछाई

उछाह अपसर करै कामणि, हेत करि मन मां हरि

विरहनी वर काज बहु विध, कलश सझियो सुंदरि

पहर पटोली पांय पायल, बीज ज्यों तन झिलमिलै

धनि दिहाड़ो धनि घड़ी, सैण साजन रल मिलै (१)

सहजे सोवण मेरा जीयो, कीजे कोड अनेरा

मोमण लाड लडैं मेरा जीयो, विक्रम ते जन तेरा

जन तेरा रमै नव खंड, जरा जीव न झंपई

अमर भोम अनंतर आनंद, रूप राम तिरजई

अमी अमृत भोग मनसा, दया कर दीन्हा दई

नर नारी आस पूगी, सो वरगां सहजां सही (२)

स्वर्गा मांहि सुख घणा मेरा जीयो, पीवै अमी कचोला

तेरा जन केल करै मेरा जीयो, हींडै सहज हिंडोला

सहज हिंडोला तेरा साथ होडै, जरा जीव नहीं जहां

वाव वेदन नाहिं व्यापै, दुःख दारिद्र नहीं तहां

मांणत सुख अनुप अधिाका, सांभलो साधू जणा

नर नारी निकलंक नेह जिणखंड,स्वर्गा मांहि सुखघणा (३)

सतगुरु साथ रमै मेरा जीयो, सुर नर सदा संगाती

ब्रह्म वेद सही मेरा जीयो, नारी बहु बैण राती

रवि रात तिथ वार न वरतै, पहर पख न बाचिये

मास वर्ष न घड़ी मुहूरत, रूप गुरु के राचिये

सदा सुख अनूप अधिका, नाहिं व्यापै आपदा

कह 'केशो' करो केला, श्याम संग खेलो सदा (४)