साखी-39
सतगुरु कृपा करी मेरा जीयो, कटजे जम का जाला
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सवैया
रागन पति है सोरठी, बाजा पति है बीण।
देशन पति है मालवो, नगरां पति उजैण।
धन बिना किसी धनाश्री, मेह बिन किसी रे मल्हार।
बिन भायां गायड किसो, बिन पूतां परिवार।
सूंता-सूंता क्या करो, जागो जपो मुरार
एक दिन ऐसा सोवणा, लांबा पैर पसार।
सतगुरु कृपा करी मेरा जीयो, कटजे जम का जाला
अणभे ज्ञान भयो मेरा जीयो, हृदय भयो उजाला
भयो उजाला घट मांय रे जीव, निरभय सतगुरु धियाइये
तीन गुण अरू ताप तीनों, तीनूंहि काल मिटाइये
तीन दासी तीन फांसी, तीनो की प्रतिपालही
जंभगुरु की हुवै कृपा, उजालो भयो घट मांय ही (१)
जामण मरण मिटै मेरा जीयो, लख चोरासी फेरा
आवागवण मिटै मेरा जीयो, छूटै कर्म कुफेरा
कर्म कुफेरा मेट रे जीव, निरभय हरि गुण गावही
गोविंद गिरधर गाय रे जीव, अलख पड़दे पावही
च्यार-खाणी च्यार वाणी, बेअंगा जुग च्यारही
कर्म कुफेरा मेट तेरा, जंभ गुरुनै धयावही (२)
जीवत मुक्त हुवै मेरा जीयो, तज मुक्ति की आशा
घट में दरश हुवै मेरा जीयो, निरभय भया निराशा
भयो निराश आश गुरु की, सास सुमरण कीजिये
पांच तत्व बीसे पांचो, पांच ससतर लीजिये
पांच आत्म पांच कोष, पांच मुदा सारही
जीवत मुक्ति हुवै तेरी, तज मुक्ति की आश ही (३)
सुखमण धियान धरो मेरा जीयो, सोहं शब्द उचारो
अजपा जाप जपो मेरा जीयो, निराकार ओंकारो
निराकार ओंकार जलपे, ज्ञान ससतर धारही
आठ तो कर्म कीट काटो, आठ उन घर मारही
सात सखी और दस पवना, दसूं काल उचारही
निराकार ओंकार जपले, ज्ञान ससतर धारही (४)
दोय पर पंछी उडै मेरा जीयो, जां सें दिल दीदारा
जल थल जीव रच्या मेरा जीयो, सतगुरु सिरजनहारा
सिरजन सतगुरु स्वामी, विश्वंभर जग पेखिये
रतन काया सुरग लाभे, सहजै सतगुरु देखिये
रतन रूपी गुरु जंभराजा, पुन पूरबले भेटिये
करजोड़ 'अमोलख' कथ साखी,जनम मरण दुख मेटिये (५)