साखी-38
सतगुरु कृपा करी मेरा जीयो, केवल ज्ञान बतायो
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सवैया
सोरठ जब ही कीजिए, सोपो पड़ जाय।
ज्ञानी हुवै सो आय सुणै, मुर्ख नींद घुराय।
सोरठ राग सुहावणी, नाकीजै हेड प्रभात।
बिछड़िया मेलो नहीं, का हुवै वेराग।
सोरठ महला उतरी, कर सोलह श्रंगार।
धूजै गढ रा कांगरा, धूजै गढ़ गिरनार।
सतगुरु कृपा करी मेरा जीयो, केवल ज्ञान बतायो
तां दिन भेद लहै मेरा जीयो, ब्रह्म ज्ञान सुधा पायो
ब्रह्म ज्ञान पायो मन दृढायो, तजो विषय अरू वासना
भगती चाहूं मोक्ष पाऊं, और कछु नहिं आसना
आन देव कूं नांय धोकूं, नांव निज हृदय धरूं
तां दिन आतम ज्ञान पायो, कृपा करी जंभ गुरु (१)
भंवर गुंजार धयान धारो मेरा जीयो, प्रगटे दीपक माला
अणभय ज्ञान भयो मेरा जीयो, हिरदै भया उजाला
भयो घट में ज्ञान दीपक, जाग सुरता देखिये
ठाम ठाम सब वस्तु दरसे, अलख पड़दे पेखिये
रतन पदार्थ मांह लाधो, हृदय कवल दरसावना
भंवर भमंग गुंजार गांही, हुयो हृदया चानणा (२)
नाभी सूं नाड़ी चली मेरा जीयो, बंक एक नाड़ बखाणी
ऊंची गिगन गई मेरा जीयो, भेद कोई बिरला जाणी
भेद बिरला संत जाणै, चढ़यो गिगन अटारियां
निरत सूरत को ख्याल देख्यो, चंद सूर दोय नाड़िया
नजदीक नैनां लाल झाईं, जोत दर्श लिव लावणा
बायें अंग बंक नाड़ि पिंगला, बंक नाड़ी रस पीवणा (३)
बिना पग ??? कर मेरा जीयो, कर बिन ताल बजावे
अनहद बाजा गिगन बाजे, ब्रह्म रूप हो पूगे
त्रिवेणी तट हंस अधार बैठो, अमोलक मोती चुगे
जोत झिलमिल इमी बरसे, तड़ तड़ चमक बादल बिना
बिना पांव नटवा निरत नाचे, ररंकार धुन बिना (४)
जीवत मुक्ति भई मेरा जीयो, मिट गई त्रिविधा वासा
जामण मरण मिटा मेरो जीयो, निर्भय भयो निराशा
भयो निर्भय सुण सतगुरु की, काल प्रबल ते ना डरूं
द्वार दसवें गगन चढ कर, सोह सिकर डेरा करूं
सत चित आनंद भेव निरगुण, धुंध मंडल पावई
'लिछमण' पद सायुज्य पायो, मुक्ति जीवत ही भई (५)