साखी-37
जां दिन हंस चलै मेरा जीयो, कुटि अंधियारो होई
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सवैया
गुरु बिन मुक्ति ना मिलै, गुरु बिन ज्ञान न होय
जोग इष्ट सिद्धांत को, गुरु बिन लहै न कोय
ब्रह्मनिष्ठ गुरु तत्त्वमसि, ताको पूछत भेद
सो ब्रह्म ज्ञान बतावसी, हरै अज्ञान भ्रम छेद
वक्ता है षट शास्त्र को, षट उरमी को त्याग
ताका मत वेदान्त है, ब्रह्म ज्ञान वैराग
इन्द्री विषय अरु वासना, माया तज अज्ञान
जोग जुगत जरणा जरो, सो पूरण ब्रह्म ज्ञान
चन्द सूर स्वासा लखे, लखे घात विपरीत
स्वासा गिगन चढायले, तो लेय काल को जीत
जां दिन हंस चलै मेरा जीयो, कुटि अंधियारो होई
गढ़ बैराय फंद पड़ै मेरा जीयो, धीरी धारै न कोई
धीरी धारै न कोय रे जीव, इंत मिंत न भाइयां
घरवास मंदिर लाछ लक्ष्मी, तजै सैल सगाइयां
लागा सो भागा तोड़ तागा, रहण नाहीं एक छिनां
अंधियारो कुटि होय रे जीव, हंस चाल्यो जां दिनां (१)
वासो तो रैण को मेरा जीयो, माया मोह न मंडे
तरवर पंछीड़ां मेरा जीयो, उड़ि गया किण खंडे
उड़िया विहंगम गया किण खंडे, बहुड़ि न कियो फेर हो
एक चिन्ता हमैं उनकी, तज्यो मोह घणेर हो
संसार मेलो बहुड़ि नाहीं, साच नहीं सुपनंतरे
उड़िया विहंगम गया किण खंडे, रैण वासो तरवरे (२)
साथि पार लंघ्या मेरा जीयो, हम बिच भुयंजल भारी
आज के कालि छिनां मेरा जीयो, तलबी ऊभा वारी
तलबी तो ऊभा वार ठाढ़ा, भरम मत कोई भूलियो
संसार राता फिरै गाफल, अंत होय दुहेलियो
जां दिन काया तजै माया, आथि न लाभै मांगिया
हम बीच भुंयजल अगम भारी, पारि साथि लांघिया (३)
विष्णुजी री सेवा करो मेरा जीयो, हिरदै हरि न बिसारि
जन्म दुर्लभ है मेरा जीयो, औगुण गुनाह निवारि
औगुण गुनाह किया घणेरा, चित चहुं दिश धावही
नव पोल टूटै आयु खुटै, मरण नेड़ो आवही
मिनखा देही दुर्लभ रे जीव, पड़यो संकट भारियां
पाप पराछित मेटि जंभगुरु, हिरदै हरि न विसारियां (४)