साखी-48
सुण मन भाई कहूं समझाई, कोप न कीजे भाई
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
श्रवंण नाद नहीं त्रपति कांम इन्द्री नहीं काजै।
नास वास नहीं त्रपति नैन पर रूप न लाजै।।
रसण रस नहीं त्रपति मन जुग माया अड़े।
जो इन्द्री के बस होय, जम के हाथे चड़े।।
पन्च पन्च सूं चिति चन्चल नहीं छरि।
चल छोडि अचल चक्रत भयो हाथ उठाय पुकारि हरि।।
सुण मन भाई कहूं समझाई, कोप न कीजे भाई
जन्म मरण नित भोगे चौरासी, डरै नहीं कदाई।
लख चौरासी दुख बहु भांति, मुख सैं बरण्यो न जाई
आयो दाव गमावै क्यूं मूरख, फेर मिलै न सदाई।
सतसंग कर काटो जम फांसी, ब्रह्म ज्ञान चित लाई
सुत वित नारी मित्र सब बंधू, तुमकूं रह्या बिलमाई।
ये सब हैं मतलब के प्यारे, अंत तजेंगे भाई
शत्रु लख इनकूं अब तजिये, ब्रह्म ध्यान नित लाई।
स्वासो स्वास जप जाप अजप्या, भूलो मत ना भाई
अनहद बाजा बाजै गिगन मां, मन कूं तहां लगाई।
अनंत भान सम तहां उजियाला, महिमा वरणी न जाई
सर्व देव ब्रह्मांड है तन में, सतसंग कर गम पाई।
हरिहर कूंभा एक भये, अब द्वितीया दूर बहाई।