साखी-49
रे मन मीठा लोभ पईठा, मनसा दिलसा काची
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सवैया
विष्णु नाव सुचि साच घट तां अवगुण घटै
क्षमा या दिढ़ जोग, पाप कुल साखी पलटै
अन्तरि ज्ञान अनन्त अंग के अरियण गंजै
पाणी अन्न अहार जाणि पर जीवन भंजै
भेदा न भेद भव भंजिबा भम्र कर्म छूटी कजा
जग प्रगटे जांभो जती, धरम तणी बांधी धजा
रे मन मीठा लोभ पईठा, मनसा दिलसा काची
हृदय ज्ञान लिखले मनवा, विष्णु महूरत वांची
बैठो हंस कायागढ बोले, नर निरहारी दीठो
क्रियासार काया कसौटी, लोभ पड़्यो मन मीठो (१)
रे मन खागा बिरचणहारा २, बिरचि कायागढ़ लेलो
जीव सत को साथ सुहेलो, साच कहूं मन सूधा चालो
कांय मन मेरो फिरै अकेलो, पांचों मांहि मुखी थोरे जीव
कूड़ कपट मोह निवारी, हरख्यो हरि जपै क्यों नांही
फिरै मूरख अहंकारी (२)
रे मन झूठा करि पांच अपुठा२, ज्यों चालो ज्यों चाली
मनहठ माण मेर जे छाड़ो, कूड़ कपट सोह पाली
पालो पवण प्रीति घण संचो, नर निरहारी दीठो
हीर पखो कांय हुजात साझो, मन झगड़ालू झूठो (३)
सत कर बंदा परहर निंदा २, पांचै जमलो कीजै
दशबंध देव तणो कांय राखो, स्वर्गे लेखो लीजै
जिहिं मन खोटा तिहिं मन तोता, न कर पराई निंदा
हिरदै जो हरख्यो हरि जपो, तो सत सीधा बंदा (४)