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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह225 / 157
प्रचलित साखी समूह दो

साखी-50

रे मन मेरा न कर मुकेरा२, काया दुलैली काची

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

इणा भूमि पर राव, रावण सु अड़िया।

इणा भूमि पर षट चकवै दल पड़िया।

इणा भूमि पर गया बारवाली ग्यारा।

इणा भूमि पर खपी अक्षोहिंणी अठारा।

सोलह सांवत वारा मंडलीक दुर्योधन संगरे दिया।

सुरजन कहे सुणो भक्त जन इतना राजा आगे हुआ।

कहो भूमि कौन संग ले गया।।

रे मन मेरा न कर मुकेरा२, काया दुलैली काची

निरत सुरत लिव लाव पियारा, शब्द अनाहद राची

तन मां तीर्थ न्हाय त्रिवेण, गगन गुफा कर डेरा

गुरु परसादे रहै मन उनमुन, यों समझे मन मेरा (१)

रे मन हंसा परिहर संसा २, सांसो शोक न कीजे

त्रिकुटि तीर्थ मनवां काजे, महा अमीरस पीजे

बडपण माण बडाई मेटो, बडपण गाल्यो बंशा

अंतर धयान उलट धुन सुनिये, करि हरि सूं हित हंसा (२)

रे मन जाणी सुण सुरबाणी २, माया मोह निवारी

अजप्यो जाप जपी मन मेरा, कर उनमुन सूं यारी

गरजै गगन अधिक धुन सुनिये, उपजै अनहद बाणी

जिहिं डोरी सिद्ध साधु विलंब्या,सो जिवड़ा सतजाणी (३)

रे मन भाई सहज समाई २, पखा पखी नहीं कीजे

परले होय पराछत बांधो, जीव दुनी मिल छीजे

सुशब्द रची मन मेरा, अलख पुरूष लव लाई

कषमल कटै कहै ज 'केशो', विष्णु सिंवर मन भाई (४)