साखी-51
रे गुरुभाई मानो विष्णु सगाई, जीव स्वार्थ सोई
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सवैया
विसन मील्यौ मन सुध, हिरदे निरमल मुख दीने
सतगुरू सुगुर पधाण्य, भाव सूं भेद पईठो
संमल्य गुर को ग्यान, जुगति सूं कर कुमाई
चाले हक विचारि जाण्य विष वसत पराई
नांव जप निरहार कौ, पर उपगारी प्रीतिधण
वील्ह कहै एक विनती, विसन मेल्य गुणवंत जण
रे गुरुभाई मानो विष्णु सगाई, जीव स्वार्थ सोई
क्षमा दया दृढ जुगत पिछाणो, आवागवण न होई
कलि मां केवल ज्ञान प्रकास्यो, उत्तम राह चलाई
संभरथल सतगुरु परचायो, भेद भला गुरुभाई (१)
यो पंथ साचा अवचल वाचा २, टलो नहीं नुरमाई
गुरु के वचने निंव खिंव चालो, जल शुचि जुगत बताई
जुगत विहूणां मुक्ति न होई, करतब न कर काचो
झूंठे झूंठ हुवैलो भारी, सांचा सो पंथ सांचो (२)
पथ जांभाणो सत कर जाणो २, असत न मानो लोई
हरि को नाम धियावो एक मन, नाम दियो बिश्नोई
परहरि पाप विरजण जोगण, विष्णु विष्णु बखाणो
निभ्रम देव निरोत्तर वाचा, सत पंथ जांभाणो (३)
रे बिश्नोई निर्मल होई २, विष की गांठ चुकावो
परहरि वाद विरोध नं कीजे, हाक हुकम सिर आवो
गुरुवट चाले ते जन साचा, कुल वट भूला लोई
'सुरजनदास' विष्णु के शरणै, सोई खरा बिश्नोई (४)