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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित साखी समूह दो

साखी-52

रे विणजारा न कर पसारा २, तांडै हुई तयारी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

उदिम कर रे आदमी उदिम दालिद जाय

जीभ विसन को नाव ले औ निस सांभि धियाय

औ निस सामि धियाय, ध्यान धरि हरिसूं राची

करो विसंन की सेव मेल्हि दे मनसा काची

ग्यान कथा मां संभलो तीनि लोक को राय

विसन जपो उदिम करो, पाप पराछित जाय

रे विणजारा न कर पसारा २, तांडै हुई तयारी

बारां कोटि समाहण मानवा, नायक नर निरहारी

नायक नर निरहारी रे मानवां, खालक खेवणहारा

क्रिया ले क्रियाणो नाणो, पार उतर विणजारा (१)

रे व्योपारी कर दिल एक तारी २, वाचा वीर संभाली

ओदर कोल किया मन मेरा, उदग्या दश बंधा टाली

दश बंध टाली खरतर चाली, निपज्यो नर निरहारी

इंहि विध पार हुवै मन मेरा, पार उतर व्योपारी (२)

रे मन चंगा तजो कुसंगा २, साध संगति मिल चाली

अजर जरो भवसागर तरिये, जिभ्या जूठे जे पाली

तन का तसकर बस कर मनवां, नित उठ न्हाये गंगा

आन देव अभिमान परिहरो, तो जाणी मन चंगा (३)

रे मसवासी जप अविनाशी २, धियान धणी सूं लाई

ओलख अलख अमर गढ चालो, जुरा न पहुंचे जाहिं

जुरा न पहुंचे जम की गम नाहीं, सुरां सुरपति निवासी

'भीमराज' विष्णु कै शरणै, मन हो गयो मेवासी (४)