साखी-53
रे मन रांती तेरी पांती २, ओगण आयो भाई
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सवैया
तनकी भूख अल्प है तीन पाव कां सेर।
मन की भूख अपार है गिटत मेर सुमेर।।
दुनियां पोखण देत है गिणत न लाभे ज्ञान
बाल विसारे मांयनै मांय न खंच मन।
तन सखर मन माछली अइयां नीर अथाग।
सुरजन एक शरीर मां तन मन का गुण जोय। ४।
रे मन रांती तेरी पांती २, ओगण आयो भाई
जिण तिण सेती मांडयो मोरचो, कूद'र कांग रचाई
कांग रचाई सिर में खाई, भूंडो दीख्यो भ्रांती
बार बार समझाऊं तेंने, विष्णु सिंवर मन रांती (१)
रे मन बूसर क्यों रह्यो रूस र २, साहब सेती सान्यां
माय देख भयो मतवालो, यह तेरे मन मान्यां
माया है अंजली को पाणी, कर सूं जासी नीसर
बार बार समझाऊं तेंने, विष्णु सिंवर मन बूसर (२)
रे मन कूड़ा तेरे मुख धूड़ा २, कूड़ी साख न दीजे
साचानै हरावै ओ मन, पत झूठां की दीजे?
पखा-पखी को न्याय चुकावै, चोवठिया में चौड़ा
बार-बार समझाऊं तेंने, विष्णु सिंवर मन कूड़ा (३)
रे मन साचा पाली वाचा २, वाचा चूक न होई
ओदर कवल किया था हरि से, निस दिन सिंवरों तोई
देव तणी दशबंध नहीं राखूं, यों करि आयो वाचा
'भीमराज' विष्णु के शरणै, विष्णु सिंवर मन साचा (४)