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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित साखी समूह दो

साखी-54

रे मन मूरख नहचा तूं रख २, भगवत तणा भरोसा

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

गयो भीम भगदत्त गयो कौरवा दल संघारण।

गयो कुंभकरण, गयो लंका पति रावण।।

गयो अर्जुनलाल, जिण नारायण खंडे।

गयो अभिमन्यु कुंवार जिणा ??? ???।

भोज गयो धारा धणी, बलि राजा पाताले थयो।

गर्व न कर रे प्राणिया, जब अवतार थिर न रह्यो।

रे मन मूरख नहचा तूं रख २, भगवत तणा भरोसा

कीट पतंग सकल कूं पोखै, दई न दीजे दोसा

दोस न दीजे हरि सिंवरीजे, चित बरत नटणी ज्यूं रख

बार बार समझायो तो कूं, विसंन सिंवरि मन मूरख (१)

रे मन कायर भजि हरि सायर २, छीलरिया कांय सोधौ

देवी देवां धोकै मूरखा, भोपा भांड परमोधौ

परमोधौ भोपा मति हीणां खोपा, बैठो मूंड मुंडायर

परपंच करि-करि जग 'स भुलाणा,बातसुणी मन कायर (२)

रे मन मंगता क्यूं रातों जगता २, जग में कोई न रहसी

रावा राव अर रंक सुरताणां, एकण मरग बहसी

मारग बहसी वदीयां लदसी, रोगी रहसी रगता

भजन कियां भवसागर तरसी, बात सुणी मन मंगता (३)

रे मन भंवरा तोहि ताकत जंवरा २, ताको जतन जु कीजै

कांठे वाली केतकी है, वांको रस नहीं पीजै

रस नहीं पीजै कांनो लीजै, मन ??? ??? ???

जन 'हरजी' जे हरि कूं ???, तो ??? मन ??? (४)