साखी-55 राग रामगिरि
जोगी रे जोगिणी न सूवो, नींद न करो पियार ।टेर।।
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जोगी रे जोगिणी न सूवो, नींद न करो पियार ।टेर। ।
जैसा सुपना रैण का, ऐसा यो संसार।
कोई जागे जुग सोवे, बिरला लहे विचार।
कई सुभागी आंबो गोपियो, खालिष के दरबार।
धींग पड़ेली आंबो सोवांणि, ???ड़ला के शुचियार।
एकण डाले हूं चड़ी, तुजे जोगिण वीर।
जिण तो डाले हूं चड़ी, तिणा घणेरी भीड़।
हाथ की मूंदड़ी गिर पड़ग्यो, कांना री ??? वीड़।
काज पड़ग्या सोवला, जां सुखे जां पीड़।
एकण डांडे जुग गयो, राजा रंक फकीर।
ए जुग अपणो कोई नहीं, संग ना चले शरीर।
जो उपजा सोई विणसणो, करणी जाणो तीर।
एक सुखासण चढ़ चल्या, एक बांधा जाय जंजीर।
दुर्लभ देव ???, बूझी घट-घट मांहिं।
बाहर था से उबरच्या, जोगी भिन्दर मांहिं।
छान पुराणी छज नुंवो, चूंय चूंय पड़े मजीठ।
लाखो इण परि चेतियो, जाय बसियो बैकुंठ।
नाम दरावो देवजी, जां सैं उतरो पार।
ऊदो बोलै वीनती, म्हारी आवागवण निवार।